Wednesday, January 6, 2016

उपनिषद कथा (ब्राहृर्षि रैक्व)



प्राचीन काल में एक राजा था, जिसका नाम था-जानश्रुति। वह बड़ा ही धर्मात्मा था और दान, व्रत, यज्ञ आदि अनेक प्रकार के धार्मिक कृत्य किया करता था। उसका राजप्रासाद अतिथियों के लिये हर समय खुला रहता था और उनके लिये राजा जानश्रुति की ओर से भोजनादि का पूरा प्रबन्ध था। वह प्रतिदिन ऋषियों, मुनियों ब्रााहृणों तथा सत्पात्रों को दान-दक्षिणा भी देता था। इसके अतिरिक्त उसने स्थान-स्थान पर धर्मशालाओं का निर्माण करवा रखा था, जहां यत्रियों के ठहरने और भोजनादि का बड़ा सुन्दर प्रबन्ध था। निर्धनों के लिये उसने अनेक स्थानों पर अन्न-सत्र भी खुलवा रखे थे, जहां से उन्हें अन्न-वस्त्र मुफ़्त मिलते थे। इस प्रकार के धार्मिक कृत्यों के कारण राजा का यश चहुँ ओर फैला हुआ था।
     राजा जानश्रुति के इन कार्यों से यद्यपि प्रजा सन्तुष्ट थी, परन्तु ऋषियों को यह सोचकर दुःख भी होता था कि इतने धर्म-कर्म करने पर भी राजा जानश्रुति अभी तक आत्म-ज्ञान से कोरा है, जिसके बिना मनुष्य जन्म-मरण के चक्र से मुक्त नहीं होता। अन्ततः उसे सही मार्ग पर लगाने तथा आत्मिक सुख की उपलब्धि कराने के लिये ऋषियों ने एक युक्ति सोची। एक दिन कुछ ऋषियों ने हंसों का रुप धारण कर लिया और उड़ते हुए ऐसे समय राजप्रासाद के ऊपर से निकले, जबकि राजा जानश्रुति राजप्रासाद की छत पर विश्राम कर रहा था। वहाँ पहुँचकर एक हंस ने अपने से आगे उड़नेवाले हंस से कहा-""राजा जानश्रुति का यश सूर्य के तेज के समान सब जगह फैल रहा है।''
     आगे वाला हंस बोला-""भाई! तुम बैलगाड़ी वाले ब्राहृर्षि रैक्व के तेज को नहीं जानते, इसीलिए तुम इस राजा जानश्रुति के तेज की इतनी प्रशंसा कर रहे हो। ब्राहृर्षि रैक्व की तुलना में तो इसका तेज़ कुछ भी नहीं है।'' पहले वाले हंस ने कहा-""वह बैलगाड़ी वाला ब्राहृर्षि रैक्व कौन है और कैसा, सो बताओ।''
     आगेवाला हंस बोला-""भाई! ब्राहृर्षि रैक्व की महिमा का क्या बखान किया जाय? वह उस जानने योग्य वस्तु को जानता है, जिसके जानने के उपरान्त और कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता। उस तत्त्व को जो भी जान लेता है, उसके समान तेज भी भला किसी का हो सकता है? ब्राहृर्षि रैक्व ब्राहृवेत्ता है, इसीलिए मैं उसके विषय में ऐसा कह रहा हूँ; क्योंकि ब्राहृ का ज्ञान हो जाने के बाद और कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता। वह मुक्त हो जाता है। राजा जानश्रुति को चूँकि अभी आत्म-ज्ञान (अथवा ब्राहृज्ञान) की प्राप्ति नहीं हुई, इसलिये धार्मिक कृत्यों के कारण केवल उसे स्वर्ग की प्राप्ति हो जाएगी, जहाँ वह स्वर्गीय सुख भोगेगा, परन्तु जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति उसकी नहीं होगी और वह मोक्ष-सुख की प्राप्ति न कर सकेगा।'' परमसन्त श्री कबीर साहिब जी इस आत्म-ज्ञान के विषय में फरमाते हैं किः-
जो  यह  एकै  जानिया , तौ  जानौ  सब  जान।
जो यह एक न जानिया, तौ सबही जान अजान।।
जो  यह  एक न जानिया , तौ बहु जाने का होय।
एकै  तें  सब  होत  हैं , सब  तें  एक  न होय।।
हंसों की ये बातें राजा जानश्रुति ने भी सुनीं और अपने सेवकों को बुलाकर कहा-""तुम लोग बैलगाड़ी वाले ब्राहृर्षि रैक्व के पास जाओ और उनसे कहो कि राजा जानश्रुति आपसे मिलना चाहता है।'' सेवकों ने पूछा-""हे राजन्! वे गाड़ी वाले रैक्व कौन हैं और कहाँ रहते हैं, सो बताओ।''
    तब राजा जानश्रुति ने हंसों के मध्य हुई सम्पूर्ण वात्र्ता उन्हें सुना दी। सुनकर सेवक ब्राहृर्षि रैक्व को ढूँढने के लिए निकल पड़े। उन्होंने अनेकों नगरों एवं ग्रामों में ब्राहृर्षि रैक्व की खोज की, परन्तु उन्हें इस कार्य में सफलता न मिली। ब्राहृर्षि रैक्व के विषय में उहें कुछ भी पता न चला। हार कर वे वापस लौट आए और सब समाचार राजा के चरणों में निवेदन किया। राजा जानश्रुति ने विचार किया कि इन लोगों ने ब्रााहृर्षि रैक्व को नगरों और ग्रामों में ही खोजा है। भला ब्राहृवेत्ता महापुरुष भीड़भाड़ वाले नगरों और ग्रामों में कहाँ रहते हैं? वे तो किसी एकान्त स्थान पर रहते होंगे। यह सोचकर उसने सेवकों से कहा-""पुनः जाओ और ब्राहृवेत्ता पुरुषों के रहने के स्थान अर्थात् किसी एकान्त स्थान में उनकी खोज करो।'' राजा का आदेश पाकर सेवक फिर ब्राहृर्षि रैक्व को ढूँढने के लिए निकले। एक दिन उन्होंने एक एकान्त स्थान पर एक ऋषि को एक बैलगाड़ी के नीचे बैठे हुए देखा। सेवकों ने उनके पास जाकर विनयपूर्वक पूछा-"'हे ऋषिदेव! क्या आपका नाम ही रैक्व है?''
     ऋषि ने उत्तर दिया-""हाँ, मैं ही रैक्व हूँ।''
     ब्राहृर्षि रैक्व का पता लग जाने से राजकर्मचारियों को अत्यन्त प्रसन्नता हुई। वे तुरन्त राजा के पास लौट आए और यह शुभ समाचार सुनाते हुए बोले-""राजन्! हमने रैक्व ऋषि का पता लगा लिया है। अमुक स्थान पर बैलगाड़ी के नीचे बैठे हुए हमने उन्हें देखा है।'' यह सुनकर राजा जानश्रुति बहुत प्रसन्न हुआ। दूसरे दिन वह छः सौ गउएँ, एक मूल्यवान कण्ठहार तथा घोड़ों से जुता हुआ एक रथ लेकर ब्राहृर्षि रैक्व के पास गया और हाथ जोड़कर बोला-""ऋषिश्रेष्ठ! छः सौ गउएँ, सोने का यह हार और रथ-ये सब मैं आपके लिये लाया हूँ। कृपा करके आप इन्हें स्वीकार कीजिये और मुझे ब्राहृज्ञान का उपदेश दीजिये।''
     राजा जानश्रुति की बात सुनकर ब्राहृर्षि रैक्व ने कहा-""अरे अज्ञानी! मुझे यह सब कुछ नही चाहिये। ये गउएँ, स्वर्ण माला और रथ अपने पास रख और यहां से चला जा।'' राजा निराश होकर वापस लौट गया और विचार करने लगा कि मैं जबकि ब्राहृज्ञान की जिज्ञासा से ऋषि की सेवा में उपस्थित हुआ था, फिर भी उन्होंने मुझे अज्ञानी कहकर क्यों सम्बोधित किया और मुझे चले जाने को क्यों कहा? कदाचित् इसलिये कि मैं बहुत थोड़े धन के बदले ज्ञान जैसी उत्तम वस्तु प्राप्त करने गया था! किन्तु बिना ज्ञान प्राप्त किये मेरा शोक दूर नहीं होगा, इसलिये मुझे ब्राहृर्षि रैक्व को प्रसन्न करने के लिये पुनः उनके पास जाना चाहिए। मन में यह विचार करके राजा जानश्रुति इस बार और भी अधिक धन-पदार्थ लेकर ब्राहृर्षि रैक्व के पास गया और हाथ जोड़कर बोला-""हे ऋषिवर! ये सब मैं आपके लिये ही लाया हूँ; आप इन्हें स्वीकार कीजिए। इसके अतिरिक्त आप जहां रहते हैं, इस गांव की सारी भूमि भी मैं आपकी भेंट करता हूँ,आप इसे भी स्वीकार कीजिए और मुझे उपदेश कीजिए।''
     ब्राहृर्षि रैक्व बोले-""अरे अज्ञानी! तू फिर यह सब कुछ ले आया। तुझे इन धन-पदार्थों का बड़ा अहंकार है। किन्तु बता! क्या इन सबसे ब्राहृज्ञान खरीदा जा सकता है?'' ब्राहृर्षि के वचन सुनकर राजा जानश्रुति की आँखें खुलीं और उसे अपनी भूल का पता चला। उसने अपने सब सेवकों को वापस भेज दिया, तत्पश्चात् धन के अभिमान से रहित होकर वह अत्यन्त नम्रता एवं दीनतापूर्वक ब्राहृर्षि रैक्व के चरणों में उपस्थित हुआ और उनके चरणों में अत्यन्त श्रद्धापूर्वक प्रणाम करते हुए विनयपूर्वक बोला-""प्रभो! मैं जानश्रुति आपके चरणों में ब्राहृविद्या का उपदेश ग्रहण करने के लिये उपस्थित हुआ हूँ। मुझ पर अनुग्रह कीजिए और मुझे अपने शिष्यत्व में लीजिए।'' तब ब्राहृर्षि रैक्व ने अधिकारी जानकर उसे ज्ञान-उपदेश किया, जिसे प्राप्त करके राजा जानश्रुति का जीवन धन्य हो गया।
      उपनिषद की यह कथा बड़ी ही शिक्षाप्रद है। भक्ति-पथ पर चलने के इच्छुक जिज्ञासुओं के लिए इसमें विचार करने और आचरण करने योग्य कई बातें मौजूद हैं। पहली बात जो विचारणीय है, वह यह है कि मनुष्य दान, यज्ञ, जप आदि चाहे जितने भी शुभकर्म कर ले, इन शुभकर्मों के करने से उसे वास्तविक ज्ञान अर्थात् ब्राहृज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती और बिना ब्राहृज्ञान के आवागमन के चक्र से मुक्ति प्राप्त करना असम्भव है। इन शुभकर्मों के करने में चूँकि मनमति सम्मिलित रहती है अर्थात मन के कहने पर चलकर मनुष्य ये सब शुभकर्म करता है, इसलिए मनुष्य के मनमें स्वाभाविक ही अहंकार की उत्पत्ति हो जाती है। राजा जानश्रुति यद्यपि शुभकर्म करता था, परन्तु उसके मन में इन शुभकर्मों का अभिमान भी था और राजा होने का अभिमान भी मौजूद था। मन में अभिमान रखकर शुभ-कर्म करना वैसा ही है जैसे स्नान करके अपने ऊपर धूल डाल लेना। गुरुवाणी का वाक हैः-
तीरथ  बरत अरु दान  करि मन मैं धरै गुमानु।
नानक निहफल जात तिहि जिउ कुंचर इसनानु।।
अर्थः-तीर्थ, व्रत और दानादि करके जो मनुष्य मन में इनका अभिमान करता है, श्री गुरुनानक साहिब फरमाते हैं कि उसके द्वारा किये हुए वे सब कर्म उसके लिये उसी प्रकार निष्फल हो जाते हैं जिस प्रकार हाथी द्वारा किया हुआ स्नान। हाथी का यह स्वभाव है कि वह स्नान करने के उपरांत सूंड से अपने शरीर के ऊपर धूल डाल लेता है।
     इसके अतिरिक्त ये सब शुभ कर्म चूँकि सकाम भावना से किये जाते हैं, अतः इनके फलस्वरुप मनुष्य को अधिक से अधिक स्वर्ग की ही प्राप्ति होती है, जहाँ बहुत समय तक स्वर्गीय सुखों को भोगने के उपरान्त उसे पुनः इस मत्र्यलोक में आना पड़ता और चौरासी के चक्र में घूमना पड़ता है। आवागमन के चक्र से उसकी मुक्ति नहीं होती। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण फरमाते हैंः-
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलेकं विशालं क्षीणे पुण्ये मत्र्यलोकं विशन्ति।
    एवं   त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना   गतागतं   कामकामा  लभन्ते ।। 9/21
खत्म हो जाता है जब ऐसे रियाज़ों का समर।
वासिलाने-ऐश का जन्नत से होता है सफर।।
पैरवाने-वेद  जिनका दिल है पुरअज़ मुद्दुआ।
जब्रा कुदरत से हैं यूँ आवागवन में मुबितला।।
अर्थः-वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर पुण्यक्षीण होने पर मृत्यु-लोक को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार स्वर्ग के साधनरुप तीनों वेदों में कहे हुए सकाम कर्म का आश्रय लेने वाले और भोगों की कामनावाले पुरुष बार-बार आवागमन को प्राप्त होते हैं अर्थात् पुण्यकर्मों के प्रभाव से स्वर्ग में जाते हैं और पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक में आते हैं।
     दूसरी बात जो उपरोक्त कथा में विचार करने योग्य है, वह यह है कि मनुष्य तीर्थ, व्रत, दान, यज्ञ आदि चाहे जितने भी साधन कर ले, आत्मज्ञान के बिना उसके ये सब कर्म-धर्म थोथे हैं और ब्राहृज्ञान की प्राप्ति मनुष्य को समय के पूर्ण ब्राहृनिष्ठ महापुरुषों की चरण-शरण में जाने पर ही होती है। पूर्ण सद्गुरु की चरण-शरण ग्रहण किये बिना मनुष्य का निस्तार नहीं हो सकता, इसीलिए सभी सन्तों एवं सद्ग्रन्थों ने समय के पूर्ण सन्त सद्गुरु की शरण ग्रहण करने पर अत्यधिक बल दिया है और इसे अनिवार्य बतलाया है। सन्तों का कथन है किः-
योग  यज्ञ  जप  तप  व्यवहारा। नेम  धर्म  संयम आचारा।।
वेद  पुराण  कहें  गोहराई । गुरु बिन सब निष्फल हैं भाई।।
गुरु  बिन  ह्मदय शुद्ध नहिं होई । कोटि उपाय करे जो कोई।।
गुरु बिन ज्ञान विचार न आवे। गुरु बिन कोई न मुक्ति पावे।।
(गुरु महिमा)
संसार में जितने भी ऋषि, मुनि, जती, तपी, सन्त, भक्त और अवतारी पुरुष हुए हैं, सभी ने समय के पूर्ण सद्गुरु की शरण में जाकर ही ज्ञान की प्राप्ति की है।
अखिल  विबुध जग में अधिकारी। व्यास वसिष्ठ महान आचारी।।
गौतम कपिल कणाद पातंजलि। जैमिनि बाल्मीकि चरणन बलि।।
ये  सब  गुरु  की  शरणहिं  आये ।  ताते  जग  में श्रेष्ठ कहाये।
(गुरुमहिमा)
कहने का तात्पर्य यह कि मुक्ति के अभिलाषी जिज्ञासु पुरुष के लिए समय के पूर्ण सद्गुरु की चरण-शरण ग्रहण करना नितान्त आवश्यक है। पूर्ण सद्गुरु ही ब्राहृज्ञान के ज्ञाता होते हैं और उनकी कृपा से अथवा उनके मार्गदर्शन में चलकर ही जिज्ञासु ब्राहृ-साक्षात्कार कर सकता है। बिना सद्गुरु की कृपा के ब्राहृज्ञान की प्राप्ति करना अथवा ब्राहृ-साक्षात्कार करना असम्भव है।
     कथा में तीसरी विचारणीय बात यह है कि सद्गुरु की शरण में जिज्ञासु को अभिमानरहित होकर नम्रता एवं दीनता धारण करके जाना चाहिए। यदि ह्मदय में अभिमान भरा है, तो फिर वह राजा जानश्रुति की तरह खाली ही लौटेगा। इसलिए फकीरों का कथन हैः-
ज़ि दावा तिहि आ कि ता पुर शवी।
चूँ  पुर  आमदी  ज़ां तिही मे रवी।।
(हज़रत मौलाना रुम साहिब)
अर्थः-ऐ मनुष्य! सत्पुरुषों की चरण-शरण में सब प्रकार के दावे से खाली होकर आ ताकि तेरा ह्मदय उनकी कृपा से भरा जाए। यदि तेरा ह्मदय पहले ही अभिमान से भरा हुआ है तो फिर सत्पुरुषों के दरबार से तू खाली ही जायेगा। गुरुवाणी का वाक हैः-
होहु निमाणा सतिगुरु अगै मत किछु आपु लखावहे।।
     इसलिये जो आत्मज्ञान का अभिलाषी है, ऐसे जिज्ञासु पुरुष को उपरोक्त सभी तथ्यों पर विचार करके अभिमान रहित एवं अकिंचन बनकर समय के पूर्ण सद्गुरु की चरण-शरण में जाना चाहिये ताकि वह उनकी कृपा से वास्तविक ज्ञान से मालामाल हो सके और अपना जीवन सफल एवं सकारथ कर सके।

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