Wednesday, January 6, 2016

सत्यवादी चोर



एक घड़ी आधी घड़ी, आधी हूँ से पुनि आध।
कबीर संगति साध की, कटे कोटि अपराध।।
     यह सन्त सत्पुरुषों की शुभ संगति का प्रताप है कि उनकी संगति से जीव का जीवन सुधर और संवर जाता है। जैसे ही जीव उनके पावन वचनों पर आचरण करता है, उसके जीवन की काया पलट हो जाती है जैसा कि निम्नलिखित प्रसंग से स्पष्ट हो जाता है।
     सन्त नामदेव जी एक बार रात के समय कहीं जा रहे थे कि उन्हें एक व्यक्ति मिला। वह चोर था और चोरी करने निकला था। सन्त नामदेव जी को देखकर उसने छिपने की कोशिश की तो सन्त नामदेव जी बोले-भाई! तुम कौन हो और मुझे देखकर छिप क्यों रहे हो? उस चोर ने सन्त नामदेव जी को पहचानकर उनके प्रणाम किया और बोला महाराज! मैं चोर हूँ और चोरी करने जा रहा हूँ। सन्त नामदेव जी ने कहा-भाई! यह धन्धा छोड़ दो और कोई ऐसा काम-धन्धा करो जिससे तुम्हें किसी को देखकर भय न लगे और छिपना न पड़े। चोर ने कहा-महाराज! मेरे पिता भी यही काम करते थे और मैं भी केवल यही काम जानता हूँ, इसके अतिरिक्त दूसरा कोई काम मैं जानता नहीं। फिर मैं पढ़ा लिखा भी नहीं हूँ और न ही मेरे पास इतना धन है कि व्यापार आदि कर सकूँ। यदि मैं यह धन्धा छोड़ दूँ तो फिर परिवार का पालन पोषण कैसे करुँगा? उसका यह उत्तर सुनकर सन्त नामदेव जी कुछ पल तो मौन रहे, फिर बोले-अच्छा भाई! तुम यह धन्धा बेशक करो, परन्तु हमारी एक बात मान लो। चोर ने कहा-आज्ञा कीजिए। सन्त नामदेव जी ने कहा- पहले वादा करो कि तुम हमारी बात मानोगे। चोर के वादा करने पर सन्त नामदेव जी बोले- आज से तुम किसी भी परिस्थिति में झूठ मत बोलना, सदा सच बोलना, तुम्हारा कल्याण होगा।
     यह कहकर सन्त नामदेव जी तो अपने रास्ते चल दिये, इधर चोर सोचने लगा कि झूठ नहीं बोलूँगा तो काम कैसे चलेगा। पर अब तो सन्त नामदेव जी से वादा किया है, अतः कुछ भी हो जाए, अपना वादा नहीं तोड़ूँगा। यह सोचकर चोर भी चोरी के इरादे से एक ओर चल दिया। कुछ दूर जाने पर उसे एक और व्यक्ति नज़र आया। वह वास्तव में वहाँ का राजा था जो भेस बदल कर नगर का भ्रमण कर रहा था। उसने भी चोर को देख लिया। राजा ने उस चोर से धीरे से पूछा-तुम कौन हो और इस समय कहाँ जा रहे हो? चोर मन ही मन विचार करने लगा कि झूठ तो मैने बोलना नहीं है, इसलिए सच-सच बता देता हूँ, जो होगा देखा जायेगा। मन में यह विचार कर उसने उत्तर दिया -मैं चोर हूँ और चोरी करने के इरादे से घर से निकला हूँ।
     राजा चकित हुआ कि यह कैसा चोर है जो स्वयं ही बता रहा है कि मैं चोर हूँ। उसने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा-क्यों हँसी करते हो? तुम अवश्य ही कोई सैनिक अथवा गुप्तचर मालूम होते हो? चोर ने कहा-नहीं, मैं मज़ाक नहीं कर रहा हूँ। मैं वास्तव में ही चोर हूँ और चोरी करना मेरा धन्धा है। राजा ने कहा-भाई! चोर तो मैं भी हूँ, परन्तु अभी नया-नया ही यह धन्धा शुरु किया है। अच्छा हुआ तुम मिल गए, आज दोनों मिलकर चोरी करते हैं। यदि तुम्हारा ख्याल हो तो राजमहल में चोरी करें। चोर बोला-पागल हो गए हो। राजमहल में कैसे घुसेंगे? राजा ने कहा-घबराओ नहीं, मेरी बात ध्यान से सुनो। मैं पहले राजमहल में नौकर था, परन्तु राजा ने किसी बात पर रुष्ट होकर मुझे नौकरी से निकाल दिया। चूँकि राजा ने मुझे निकाला था, इसलिए दूसरा कोई मुझे नौकरी देने को तैयार नहीं हुआ,इसलिए मैंने यह धन्धा अपनाया। मुझे राजमहल के एक-एक गुप्त द्वार का पता है, चलो आज राजमहल में भाग्य आज़माते हैं। यह कहकर राजा उस चोर को साथ लेकर राजमहल के पिछवाड़े जा पहुँचा और गुप्त मार्ग का द्वार खोलते हुए बोला-तुम पुराने चोर हो, अन्धेरे में देखने का तुम्हें अभ्यास है, इसलिए तुम अन्दर जाकर माल बटोर लाओ, मैं यहीं पहरा देता हूँ।
     चोर ने कहा-इतने बड़े महल में मुझे कैसे मालूम होगा कि माल कहाँ रखा है? राजा ने उसे ख़ज़ाने का रास्ता और वहाँ तक पहुंचने की सब युक्ति समझा दी। चोर अन्दर घुसा और ख़ज़ाने के द्वार पर जा पहुँचा। वहाँ दीवार पर एक चर्खी लगी हुई थी, उसे घुमाते ही द्वार खुल गया। चोर ने देखा, वहाँ अनेकों बड़े-बड़े मज़बूत बक्से रखे हैं, जिनमें बड़े-बड़े ताले लगे हुए हैं। उसने चाबियों का गुच्छा तथा कुछ दूसरे औज़ार निकाले और एक बक्से का ताला खोलने की कोशिश की, परन्तु उसकी सब कोशिश असफल हुई। उसने यह सोचकर कमरे में दृष्टि दौड़ाई कि शायद कोई लोहे की सलाख वगैरह मिल जाए, तभी उसकी निगाह एक बक्से पड़ गई, जो साईज़ में छोटा था और एक बड़े बक्से के ऊपर रखा हुआ था। उसने उसका ताला खोलने की कोशिश की, थोड़े ही प्रयत्न से ताला खुल गया। उसने ढक्कन उठाकर देखा, तो उसमें एक छोटी संदुकची के अतिरिक्त और कुछ न था। उसने संदूकची बाहर निकाली। जैसे ही ढक्कन खोला, उसकी आँखें चमक उठीं। उसमें तीन बहुमूल्य हीरे रखे हुए थे। उसने वे तीनों हीरे उठाये और वहां से चलने लगा, तभी उसके दिल में विचार आया कि हीरे तो तीन हैं, हम दोनों इनका आधा आधा भाग कैसे करेंगे। मैं झूठ बोलकर एक हीरा अधिक अपने पास रख लूँ, यह मैं करुँगा नहीं, क्योंकि मैने झूठ न बोलने का वादा सन्तों से किया है। यह सोचकर उसने एक हीरा संदूकची में वापस रख दिया और दो हीरे लेकर महल से बाहर आ गया। बाहर आकर उसने राजा से कहा- ये दो हीरे लाया हूँ, एक तुम्हारा एक मेरा। यह कहकर उसने एक हीरा राजा को थमाया और यह जा, वह जा।
    उसके जाने के बाद राजा ने सोचा कि हीरे तो उस संदूकची में तीन थे, फिर उसने यह क्यों कहा कि मैं दो हीरे लाया हूँ। चलकर देखना चाहिए। यह सोचकर राजा वहाँ गया, तो क्या देखता है कि एक हीरा संदूकची में ही रखा हुआ है। राजा बड़ा हैरान हुआ कि यह कैसा चोर है, जो चोरी भी करता है और सच भी बोलता है। राजा ने ख़ज़ाने का द्वार खुला छोड़ दिया और अपने शयन कक्ष में जाकर सो गया। सुबह हुई और थोड़ी ही देर में हल्ला मच गया कि राजमहल के ख़ज़ाने में चोरी हो गई है। राजा ने अपने मंत्री को बुलवाया और चोरी के बारे में बतलाते हुए कहा-ख़ज़ाने का द्वार खुला हुआ मिला है, अवश्य ही यह किसी भेदी का काम है। शीघ्र ही इसकी जाँच करो और चोर का पता लगाओ।
     मंत्री "जो आज्ञा' कहकर ख़ज़ाने वाले कमरे में गया। सब बक्से ज्यों के त्यों रखे हुए थे, केवल एक छोटे बक्से का ढक्कन खुला हुआ था। उसने उसमें से छोटी संदूकची निकालकर देखा, उसमें एक हीरा रखा हुआ था। मंत्री को पता था कि इस संदूकची में तीन बहुमूल्य हीरे थे। सोचने लगा कि ऐसा प्रतीत होता है कि चोर जल्दी में एक हीरा इसी में छोड़ गया। अब क्यों न यह हीरा मैं रख लूँ? चोरी तो हुई ही है, चोर जब पकड़ा जाएगा तो वह लाख कहता रहे कि मैने दो हीरे चुराये थे, उसकी कौन मानेगा। यह सोचकर उसने वह हीरा अपनी जेब में डाल लिया और फिर राजा को आकर सूचना दी कि शेष सब बक्से तो ठीक-ठाक रखे हैं, केवल वह बक्सा खोेला गया है जिसमें तीन हीरे रखे थे। वे तीनों हीरे चोर ले गया है।
    मंत्री की यह बात सुनकर राजा मुसकरा दिया। तत्पश्चात् उसने मंत्री को शीघ्र ही चोर को तलाश करने का आदेश दिया। तलाश शुरु हुई और खोजियों द्वारा शीघ्र ही चोर को पकड़ लिया गया और राज दरबार में पेश किया गया। राजा ने चोर से पूछा-क्या रात को तुम्हीं ने राजमहल में घुसकर चोरी की है? चोर ने हाथ जोड़कर कहा-जी हाँ, राजा साहिब! चोरी तो मैने ही की है और मैं इसका दण्ड भुगतने को भी तैयार हूँ, परन्तु मेरे साथ एक अन्य चोर भी इसमें शामिल था। मंत्री ने पूछा-वह कौन है, उसका नाम बताओ।
     चोर ने उत्तर दिया-मैं उसका नाम नहीं जानता और न ही यह जानता हूँ कि वह कहाँ रहता है। रात को पहली बार ही उससे मेरी मुलाकात हुई थी और उसी ने गुप्त द्वार से खज़ाने तक पहुँचने का मुझे रास्ता भी बतलाया था। मंत्री कहने लगा-वाह! क्या कहानी गढ़ी है। उसका नाम-पता शीघ्र ही बता दो, वरना खाल खिंचवा दी जायेगी। चोर ने कहा- आप जो सलूक चाहें मेरे साथ करें, परन्तु मैं सच कहता हूँ कि मुझे उसका नाम-पता नहीं मालूम। मैं रात की सारी घटना आप लोगों को सुनाता हूँ। यह कहकर उसने रात की सारी घटना ज्यों की त्यों वर्णन कर दी और वह हीरा, जो उसके पास था, निकाल कर राजा के आगे रख दिया। सुनकर मंत्री क्रोध से भड़क उठा-तुम चोर हो, तुम्हारी बातों पर विश्वास नहीं किया जा सकता। तुम कहते हो कि तुमने दो हीरे चुराये थे और उनमें से एक अपने साथी को दिया था, परन्तु चोरी तो तीनों हीरे हुए हैं, फिर तीसरा हीरा कहाँ गया?
     चोर के कुछ कहने से पहले ही राजा बोल पड़ा-मंत्री जी! यह चोर ठीक कह रहा है, हीरे दो ही चोरी हुए थे और इसने उनमें से एक हीरा अपने साथी को दिया था और एक स्वयं  रखा था और इसका सबूत यह है कि रात को इसका साथी मैं ही था। मैं रात को भेस बदलकर जब नगर में घूम रहा था, तब इससे मेरी मुलाकात हुई थी। और जो हीरा इसने मुझे दिया था, वह यह रहा। यह कहकर राजा ने जेब से हीरा निकालकर सामने रख दिया। दरबार में सन्नाटा छा गया। राजा कुछ देर मौन रहा, फिर बोला-जब यह मेरा हिस्सा मुझे देकर चला गया, तो मैने खज़ाने में आकर इसकी जाँच की, कि यह झूठ बोल गया है कि सच और मुझे वहाँ पहुँचकर और यह देखकर बड़ी हैरानी हुई कि तीसरा हीरा संदूकची में ही था, मंत्री जी! वह हीरा आप अपनी जेब में से निकालिये। राजा के यह कहते ही सबकी नज़रें मंत्री की ओर घूम गर्इं, जो अब भय के मारे थर्र-थर्र काँप रहा था। राजा के आदेश से हीरा उसके पास से बरामद कर लिया गया और चोरी के अपराध में उसे कारागार में डाल दिया गया।
      तत्पश्चात् राजा ने चोर से कहा-तुम चोरी भी करते हो और फिर सच भी बोलते हो, उसका क्या रहस्य है? चोर ने सन्त नामदेव जी से मिलने और उनसे सदा सच बोलने का वादा करने का सम्पूर्ण वृत्तान्त राजा को सुना दिया। राजा ने कहा-मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ और तुम्हें अपना मंत्री बनाना चाहता हूँ।
     चोर ने कहा-राजा साहिब! यह आपकी मेहरबानी है। परन्तु जिनका वचन मानने से ही आज मुझे आप मंत्री पद देने को तैयार हो गये हैं, मैं तो अब उनकी ही शरण में रहूँगा और उनके वचनानुसार चलकर अपने जीवन का कल्याण करुँगा, ऐसा मैने निश्चय कर लिया है। तत्पश्चात् यह सन्त नामदेव जी की शरण में गया और उनकी संगति में सेवा और सुमिरण करके उसने परम पद की प्राप्ति की।

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