अठारहवीं शताब्दी की बात है, महाराष्ट्र प्रान्त के सतारा ज़िले के बिटे नामक गाँव में एक ब्रााहृण रहते थे, जिनका नाम था-गोपाल पंत। वे विद्वान थे और विद्यार्थियों को पढ़ाकर जैसे-तैसे जीवन-निर्वाह करते थे। गोपाल पंत विवाहित थे और उनका एक पुत्र था, जिसका नाम था-ज्येतिपंत। गोपाल पंत की पत्नी बड़ी भक्तिमती थी और प्रातःकाल उठकर प्रभु-नाम का जाप नित्यनियम से किया करती थी। माता को नाम का जाप करते देखकर ज्योतिपंत भी उसके पास आकर बैठ जाते और माता के स्वर में स्वर मिलाकर जाप करने लगते। धीरे-धीरे उनमें भक्ति के भाव दृढ़ होते गए। गोपाल पंत ने उन्हें विद्या पढ़ाने का बहुत प्रयत्न किया, अनेक प्रकार से समझाया, यहाँ तक कि उन्हें मारा-पीटा भी, परन्तु भगवान के नाम के अतिरिक्त ज्योति पंत को न तो कुछ पढ़ना ही आया और न ही कुछ याद हुआ, यहाँ तक कि गायत्री मन्त्र भी उनसे न रटा गया। इस प्रकार ज्योति पंत की आयु बीस वर्ष की हो गई।
एक व्यक्ति विद्वान हो, दूसरों को विद्या-दान देता हो, पढ़ा लिखाकर उन्हें इस योग्य बनाता हो कि संसार में वे विद्वान कहलायें और सही ढंग से अपना जीवन-निर्वाह करें, परन्तु उसी का अपना पुत्र निरक्षर भट्ट हो, तो उसे दुःख होना स्वाभाविक है। अपने पुत्र ज्योति पंत को भी अनपढ़ देखकर गोपाल पंत को बहुत दुःख तो होता ही, ग्रामवासियों के सम्मुख उन्हें लज्जा भी अनुभव होती। इसी दुःख में एक दिन उन्हें क्रोध आ गया और वे ज्योति पंत को बुरी तरह से फटकारते हुए बोले-""तुम्हारे जैसे पुत्र की अपेक्षा तो पुत्रहीन रहना अधिक अच्छा है। मेरी आँखों से दूर हो जाओ और तब तक मेरे सामने न आना जब तक तुम विद्या पढ़कर विद्वान न हो जाओ। मैं तुम्हारे जैसे अनपढ़ एवं अयोग्य पुत्र का मुँह भी नहीं देखना चाहता।''
गोपाल पंत विद्वान थे, परन्तु कोरे विद्वान। सन्त महापुरुषों का कथन है कि शास्त्र पढ़-पढ़कर और उन्हें मुखाग्र कर चाहे कोई कितना ही बड़ा विद्वान क्यों न हो जाए,यदि उस ह्मदय में भगवान के नाम का वासा नहीं हुआ, भगवान की याद यदि उसके ह्मदय में नहीं है तो फिर उसकी सारी विद्वत्ता, उसका सभी पढ़ना-पढ़ाना थोथा है। सत्पुरुष श्री गुरुनानकदेव जी महाराज फरमाते हैं किः-
पड़ि पड़ि गडी लदीअहि पड़ि पड़ि भरीअहि साथ।
पड़ि पड़ि बेड़ी पाईये पड़ि पड़ि गडीअहि खात।।
पड़िअहि जेते बरस बरस पड़ीअहि जेते मास।
पड़अहि जेती आरजा पड़ीअहि जेते सास।
नानक लेखे इक गल होरु हउमै झखणा झाख।।
अर्थः-""यदि पढ़ पढ़कर इतनी पुस्तकें एकत्र कर ली जाएँ कि उनसे गाड़ियाँ भर जाएँ और साथ ले जाते समय काफ़िला बन जाए, पढ़-पढ़कर इतनी पुस्तकें एकत्र कर ली जाएँ कि नदी पार करते समय नाव उनसे भर जाए अथवा खेत उनसे पुर हो जाये, जीवन के जितने वर्ष और जितने मास हैं, सब पढ़ने में व्यतीत कर दिये जाएँ, आयु पर्यन्त पढ़ा जाए और श्वास-श्वास में पढ़ा जाए, तो भी यह किसी लेखे में नहीं है। श्री गुरुनानक देव जी महाराज फरमाते हैं कि लेखे में तो एक ही बात है कि ह्मदय में भगवान का नाम बस जाए, भगवान की याद बस जाए। यदि यह नहीं हुआ तो फिर सब पढ़ना-लिखना जीवन पर्यन्त झख मारना ही है।'' इस विषय में यहाँ सत्पुरुष श्री गुरु नानकदेव जी महाराज के बाल्यकाल की कथा दे देना उचित प्रतीत होता है,क्योंकि उपरोक्त विषय पर वह पूरा-पूरा प्रकाश डालती है।
श्री गुरु नानकदेव जी को उनके पिता कालू बेदी पंडित जी के पास ले गए ताकि वे कुछ पढ़-लिख लें।
पंडित जी ने जब पट्टी लिखकर श्री गुरु नानकदेव जी को दी तो उन्होने पंडित जी से प्रश्न किया-""पंडित जी! क्या आप स्वयं पढ़े-लिखे हैं जो मुझे पढ़ाने जा रहे हैं।'' पंडित जी बोले-""मैं सब कुछ पढ़ा हुआ हूँ-हिसाब-किताब, भूगोल, इतिहास आदि सभी कुछ पढ़ा हूँ। इसके अतिरिक्त वेद-शास्त्र भी मुझे कण्ठस्थ हैं।''श्री गुरु नानकदेव जी ने फरमाया-""यह जो कुछ पढ़ाई है, यह सब तो व्यर्थ है।''
पंडित जी ने पूछा-'' फिर कौन सी पढ़ाई पढ़ना सार्थक है। यदि आपको पता है तो बताओ। सारा संसार तो यही पढ़ाई पढ़ता है जो हम पढ़ाते हैं।''तब श्री गुरु नानकदेव जी ने फरमायाः-
""जालि मोहु घसि मसु करि मति कागदु करि सारु।।
भाउ कलम करि चितु लेखारी गुर पुछि लिखु बीचारु।।
लिखु नामु सालाहु लिखु लिखु अंतु न पारावारु।।1।।
बाबा एहु लेखा लिखि जाणु।।
जिथै लेखा मंगीए तेथै होइ सचा नीसाणु।।1।।रहाउ।।
अर्थः- माया के मोह को जलाकर कोयला कर दो और उस कोयले को पीस कर स्याही बनाओ, शुद्ध विचार वाली निर्मल मति का कागज़ बनाओ, प्रेम की लेखनी करो, चित्त को लेखक बनाकर गुरु से पूछकर उसके बताये हुए विचारों को लिखी। अपनी शुद्ध बुद्धि के कागज़ पर परमात्मा का नाम लिखो, परमात्मा की गुण-स्तुति लिखो और उसकी अनन्तता का वर्णन लिखो। बाबा! इस प्रकार का लेखा लिखना सीखो ताकि जहाँ अर्थात् प्रभु के दरबार में तुम्हारे लेखों की जाँच होनी है, वहाँ उन लेखों की परवानगी तुम्हारे पास पहले से ही मौजूद हो।''
पंडित जी ने प्रश्न किया-""जो परमेश्वर का नाम जपते हैं तो उनको नाम जपने से क्या लाभ होता है?'' श्री गुरु नानकदेव जी ने फरमायाः-
""जिथै मिलै वडिआईआं सद खुसीआं सद चाउ।
तिन मुखि टिके निकलहि जिन मनि सचा नाउ।।
करमि मिलै ता पाईए नाही गली वाउ दुआउ।।2।।
अर्थः-जिनके पास परमेश्वर के नाम की पूँजी होती है, परमात्मा के दरबार में उनकी ही इज्ज़त होती है और उनकी ही स्थायी खुशियाँ और स्थायी आनन्द प्राप्त होता है। उन्हीं के माथे तिलक लगता है अर्थात् वहाँ वही सम्मान पाते हैं जिनके ह्मदय में परमात्मा का सच्चा नाम बसा होता है। किन्तु नाम की प्राप्ति तभी होती है जब प्रभु की कृपा होती है, व्यर्थ की बातें बनाने से नाम की प्राप्ति नहीं होती।''
श्री गुरुनानकदेव जी के वचन सुनकर पंडित जी बड़े चकित हुए। उन्होंने कहा-""जो परमेश्वर का नाम जपते हैं, उनके लिए प्रायः ऐसा देखा जाता है कि जीवन में उन्हें न तो खाने-पीने को ही अच्छा मिलता है और न ही ढंग का कपड़ा पहनने को मिलता है। इसके विपरीत जो परमेश्वर को कभी याद नहीं करते, वे ऐश करते हैं और संसार के सुख भोगते हैं। श्री गुरु नानकदेव जी ने फरमायाः-
इकि आवहि इकि जाहि उठि रखीअहि नाव सलार।।
इकि उपाय मंगते इकना वडे दरबार ।।
अगै गइआ जाणीऐ विणु नावै बेकार।।3।।
अर्थः-संसार में कोई जीव आता है (जन्म लेता है) कोई यहाँ से जाता है (मृत्यु को प्राप्त होता है) और कोई अपने को सबका सरदार कहाता है। एक जन्मजात निर्धन और भिखमंगा होता है और एक दरबार सजाता है, परन्तु आगे (परलोक में) जाने पर ही पता लगता है कि नाम के बिना अमीरी और सरदारी सब बेकार है।'' आगे फरमायाः-""पंडित जी! यदि यहाँ कोई धनवान है और अनेक प्रकार के सुख भोगता है, परन्तु परमात्मा का नाम नहीं सुमिरता तो उनको आगे ऐसा दण्ड मिलेगा जैसे अनाज के दानों को चक्की देती है, तिलों को तेली देता है और कपड़े को धोबी देता है। इसके विपरीत जो परमेश्वर का भजन-सुमिरण करते हैं, वे यहाँ चाहे माँग कर खाते हैं, परन्तु परमेश्वर के दरबार में उनको बड़ाई मिलेगी और धर्मराज भी उनका आदर करेगा।''
यह सुनकर पंडित जी बोले-""आप तो बड़ी भक्ति वाली बातें करते हैं। अभी तो आप बालक हैं, आपने अभी माता-पिता को सुख देना है। आपने भी संसार का सुख देखना है। अभी आपकी आयु ही क्या है? अभी तो आपने गृहस्थ करना है और संसार के सम्बन्ध निभाने हैं, अभी से भक्ति की बातें क्यों करते हैं?'' यह सुनकर श्री गुरुनानकदेव जी ने फरमाया-""पंडित जी, सुनिये!
भै तेरै डरु अगला खपि छिजै देह ।।
नाव जिना सुलतान खान होंदे डिठे खेह।।
नानक उठी चलिआ सभि कूड़े तुटे नेह।।4।।
अर्थः-साहिब का भय और आगे का अर्थात् परलोक का डर मुझे कचोटता है। मेरा शरीर दुखित होकर छीज रहा है, क्योंकि जो यहाँ अपने को खान और सुलतान कहाते हैं, वे सब भरकर मिट्टी में मिलते देखे गए हैं। प्रत्येक जीव अन्ततः संसार से विदा हो जाता है और सभी मिथ्या नेह के नाते टूट जाते हैं। इसलिए पंडित जी! इस मिथ्या संसार और संसार के मिथ्या सम्बन्धों से क्या प्रीत करनी है और इस संसार की पढ़ाई को क्या पढ़ना है? भक्ति की सच्ची पढ़ाई पढ़नी चाहिये और उस परमेश्वर के नाम का सुमिरण करना चाहिये जो सकल सृष्टि का स्वामी है।''
बस! उन पंडित जी की तरह की गोपाल पंत की भी दशा थी अर्थात् वे विद्वान तो अवश्य थे, दूसरों को पढ़ा-लिखाकर विद्वान भी बनाते थे, परन्तु सच्ची पढ़ाई से वे कोसों दूर थे। उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं था कि जिसने प्रभु-नाम के दो अक्षर पढ़ लिए, प्रभु-नाम को अपने ह्मदय में बसा लिया, उसने मानों सब कुछ पढ़ लिया। किन्तु जिसने यह पढ़ाई नहीं पढ़ी, वह सब शास्त्रों का ज्ञाता होते हुए भी मानो अनपढ़ है। सत्पुरुषों के वचन हैं किः-
जिन यह एकै जानिया , तौ जाने सब जान।
जिन यह एक न जानिया, तौ सब जान अजान।।
इस प्रकार गोपाल पंत जहाँ केवल सांसारिक विद्या में ही प्रवीण थे, वहाँ ज्योति पंत प्रभु-नाम की सच्ची पढ़ाई पढ़कर अपना लोक-परलोक संवारने में लगे हुए थे।
अस्तु, जब गोपाल पंत ने अपने पुत्र ज्योति पंत को फटकारते हुए ये शब्द कहे कि ""तुम्हारे जैसे पुत्र की अपेक्षा तो पुत्रहीन रहना अधिक अच्छा है। मेरी आँखों से दूर हो जाओ और तब तक वापस न आना जब तक तुम विद्या पढ़कर विद्वान न हो जाओ। मैं तुम्हारे जैसे अनपढ़े अयोग्य पुत्र का मुँह भी नहीं देखना चाहता'' तो ज्योति पंत उसी समय घर से निकल पड़े और वन की ओर चल दिये। ज्यों-ज्यों वे चलते गए, वन अधिक घना होता गया। वन में काफी आगे जाने पर वे एक ऐसे स्थान पर पहुँचे, जहाँ गणेश जी का एक मन्दिर था। मन्दिर को देखकर इस बात का स्पष्ट भान होता था कि वर्षों से इस मन्दिर में कभी कोई नहीं आया, क्योंकि मन्दिर की दीवारें जीर्ण-शीर्ण हो रही थीं और अन्दर धूल-मिट्टी जमा थी। गणेश जीे की प्रतिमा को देखते ही ज्योति पंत को पिता के एक बार कहे हुए वचन याद आ गए कि गणेश जी सभी विद्याओं के दाता है। ज्योति पंत सोचने लगे कि गणेश जी को प्रसन्न कर उनसे विद्या का वरदान माँगना चाहिए। बस! फिर क्या था? ज्योति पंत वहीं डट गए। उन्होंने वृक्ष की पतली-पतली टहनियां तोड़ कर एक झाड़ू बनाई और सर्वप्रथम मन्दिर की अच्छी तरह से सफाई की। मन्दिर के निकट ही एक छोटी-सी नदी बह रही थी। ज्योति पंत ने उसमें स्नान किया। तत्पश्चात् पत्तों का एक दोना बनाया और नदी से उस दोने द्वारा जल ला-लाकर गणेश जीे की मूर्ति को स्नान कराया, फिर वे गणेश जी की मूर्ति के सम्मुख बैठ गए और लगे प्रार्थना करने।
इधर ज्योति पंत की माता को जब इस बात का पता चला कि पिता के बुरी तरह से डाँटने-फटकारने पर ज्योति पंत कहीं चले गए हैं, तो वह चिंतित हो उठी। पास-पड़ोस में उनके जो मित्र और सहपाठी थे, माता ने सभी से पूछताछ की, परन्तु ज्योति पंत के बारे में कुछ भी पता न लगा कि वे किधर गए। माता के दुःख का पारावार न रहा। उसने रो-रोकर आसमान सिर पर उठा लिया। गोपाल पंत ने गाँव के आसपास सब जगह खोज की, अनेक लोगों से पूछा, परन्तु ज्योति पंत के विषय में कुछ भी पता न लगा। इस प्रकार सात दिन बीत गए।
उधर मन्दिर में ज्योति पंत निरन्तर छः दिन तक गणेश जी से प्रार्थना करते रहे। उन्होंने इन छः दिनों में न ही कुछ खाया, न पिया और न ही एक पल के लिए भी आँख झपकी। उन्होंने ह्मदय में यह दृढ़ निश्चय कर लिया था कि जब तक गणेश जी साक्षात् प्रकट नहीं होंगे, तब तक वे जल भी ग्रहण नहीं करेंगे, चाहे उनकी मृत्यु ही क्यों न हो जाए? उनका ऐसा दृढ़ निश्चय देखकर अन्ततः गणेश जी प्रकट हुए और ज्योतिपंत से वरदान माँगने को कहा। ज्योति पंत गणेश जी के दर्शन कर अति प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा-""भगवन्! पहले तो मेरे मन में यह इच्छा थी कि मैं आपसे विद्या का वरदान माँगूँगा, परन्तु अब विद्या की मुझे कोई इच्छा नहीं रही। अब तो आप मुझे भगवान की निष्काम प्रेमाभक्ति का ही वरदान दीजिये।''
गणेश जी ने प्रसन्न होकर कहा-""तुम्हारी पहली इच्छा तो इसी क्षण पूरी हो जायेगी अर्थात् इसी क्षण से तुम्हें सारी विद्यायें आ जायेंगी। किन्तु तुम्हारे मन में भगवान की प्रेमाभक्ति की जो इच्छा है, वह कुछ समय के बाद पूरी होगी। तुम जब काशी जाओगे तो वहां सन्त श्री व्यासदेव जी से, जो समय के पूर्ण महापुरुष हैं, तुम्हारा मिलाप होगा। उनकी शरण में जाने पर तुम्हें तत्त्वज्ञान की भी प्राप्ति होगी और भगवान की प्रेमा-भक्ति की भी। आवश्यकता पड़ने पर मुझे याद करना, मैं हर प्रकार से तुम्हारी सहायता करुँगा। यह कहकर गणेश जी अन्तर्धान हो गए। ज्योतिपंत गणेश जी से वरदान प्राप्त कर घर वापस आ गए। उन्हें देखकर माता की जान में जान आई। जब गोपाल पंत तथा अन्य ग्रामवासियों को ज्योति पंत ने यह बताया कि गणेश जी के वरदान से उन्हें सभी विद्यायें प्राप्त हो गई हैं, तो उनकी बातों पर किसी को विश्वास न आया। परन्तु जब उन्होंने शास्त्रों के अनेक श्लोक सुनाये तथा पिता के अनेक प्रश्नों का समुचित उत्तर दिया, तब जाकर कही ग्रामवासियों को तथा उनके पिता को उनकी बातों पर विश्वास हुआ। उनको सभी विद्याओं में पारंगत देखकर गोपाल पंत को अत्यन्त प्रसन्नता हुई।
ज्योतिपंत के मामा, जिनका नाम महीपति था, पूना में रहते थे और पेशवा के प्रधान कार्यकर्ता थे। उनका सारा हिसाब-किताब महीपति ही रखते थे। उनके अधीन कई कर्मचारी थे ज्योतिपंत की माता ने उन्हें महीपति के पास भेजने का विचार किया। एक दिन अवसर पाकर उसने अपने पति गोपाल पंत से कहा-""मेरा विचार है कि ज्योति को महीपति के पास पूना भेज दिया जाए। उसके पास रहकर यह कुछ काम-काज सीख जायेगा और हो सकता है, वहीं राज्य में इसे कोई अच्छी-सी नौकरी भी मिल जाए। तब इसका विवाह होने में भी आसानी रहेगी। आगे जैसा आप उचित समझें।''
गोपाल पंत इस बात पर राज़ी हो गए और ज्योति पंत को पूना भेज दिया गया। महीपति ने चार रुपये महीने की नौकरी पर उन्हें अपने पास ही रख लिया। उन्हीं दिनों क्या हुआ कि पेशवा को किसी ने शिकायत कर दी कि महीपति हिसाब-किताब ठीक से नहीं रखते। उनका काम बिल्कुल अधूरा पड़ा है, पता नहीं इसका क्या कारण है? आप इस बात का पता लगायें और बही-खातों का स्वयं निरीक्षण करें, हो सकता है उनके हिसाब-किताब में गड़बड़ी हो। पेशवा को अब तक महीपति पर पूरा विश्वास था, क्योंकि महीपति एक ईमानदार और सच्चे व्यक्ति थे, परन्तु शिकायत करने वाले ने कुछ इस ढंग से बातें कीं कि पेशवा के मन में सन्देह उत्पन्न हो गया। उन्होंने महीपति को बुलाकर कहा-""तीन दिन में सारा हिताब-किताब बनाकर हमारे सामने प्रस्तुत करो, यह हमारा आदेश है। हम स्वयं उसकी जाँच करेंगे।''
पेशवा का यह आदेश सुनकर महीपति घबरा गए, क्योंकि काम बहुत अधिक बाकी पड़ा था। कार्यालय के सारे कर्मचारी मिलकर यदि दिन-रात भी काम करते तो कार्य पूरा होने में कम से कम एक महीना अवश्य लग जाता। किन्तु पेशवा के समक्ष कुछ कहने का महीपति का साहस न हुआ। उन्हें चिंतातुर देखकर ज्योति पंत ने उनसे कहा-""मामा जी! आप किसी प्रकार की चिन्ता न करें। मैं तीन दिन में सारा हिसाब-किताब ठीक कर दूंगा। आप मेरी बात पर विश्वास करके केवल इतना करें कि एक एकान्त कमरे में बही-खाते रखवाकर कमरा बन्द कर दें जिससे कि मैं निर्विघ्न रुप से अपना कार्य कर सकूँ।'' यह सुनकर सभी कर्मचारी खूब ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। एक कर्मचारी ने हँसी भरे स्वर से कहा-""जिस कार्य को हम सब मिलकर एक महीने में भी पूरा नहीं कर सकते, यह कल का छोकरा तीन दिन में पूरा कर देगा।'' यह कहते हुए ठहाका मारकर हँसा। किन्तु ज्योति पंत उन कर्मचारियों के हँसने पर तनिक भी विचलित न हुए। उनके चेहरे पर ऐसा दृढ़ता और आत्म-विश्वास झलकता देखकर महीपति ने ज्योति पंत की बात मान ली और एक कर्मचारी को सब व्यवस्था करने का आदेश दिया। एक कमरे में गद्दा-तकिया लगा दिया गया, रोशनी के लिए लैम्प रख दिया गया। और बही-खाते, कलम-दवात तथा कागज़ आदि भी रख दिए गए। इसके अतिरिक्त खाने के लिए फल और पीने के लिए जल भी रख दिया गया। ज्योति पंत ने उस कमरे में प्रविष्ट होकर कहा-""मामा जी! आप बाहर से द्वार बन्द कर लें और जब तक मैं आवाज़ न दूँ, द्वार न खोलें। मैं तीन दिनों में सारा कार्य पूरा कर दूँगा, आप विश्वास रखें।''
महीपति ने द्वार बन्द किया और बाहर से साँकल चढ़ाकर ताला लगा दिया। द्वार बन्द हो जाने पर ज्योति पंत ने गणेश जी की स्तुति कर उनका स्मरण किया। गणेश जी तुरन्त प्रकट हो गए। ज्योति पंत ने उन्हें सारी बात बताते हुए कहा-""मैने मामा जी को वचन दिया है कि तीन दिन में सारा हिसाब बना दूँगा। आप इस कार्य में मेरी सहायता करें।'' गणेश जी ने कलम हाथ में पकड़ी और कुछ ही क्षणों में सब बही-खाते ठीक करके वे अन्तर्धान हो गए।
इधर दो दिन तो जैसे-तैसे बीत गए। तीसरे दिन कुछ लोगों ने महीपति से कहा-""तुमने अनुभवहीन बालक पर विश्वास कर लिया यह ठीक नहीं किया। वह बही-खाते कहाँ से ठीक कर लेगा? दूसरी बात यह कि तुमने उसे कमरे में बन्द करके बाहर से ताला लगा दिया है, यदि उसको कुछ हो गया तो सारा पाप तुम्हारे सिर पर होगा। तुम्हें सारा जीवन उसके माता-पिता की बातें सुननी पड़ेंगी। और यदि उसकी दुःखी माता ने तुम्हें शाप दे दिया तो तुम कहीं के न रहोगे।'' महीपति तो वैसे ही यह सोचकर अत्यन्त व्याकुल हो रहे थे कि न जाने ज्योतिपंत से खाते पूरे होंगे भी या नहीं, अब लोगों की बातें सुनकर तो वे बुरी तरह घबरा गए और तुरन्त कमरा खोलने के लिए तैयार हो गये। जैसे ही उन्होंने ताला खोला,अन्दर से ज्योति पंत की आवाज़ आई-""मामा जी! द्वार खोल दीजिये, बही-खाते सब तैयार हैं।'' द्वार खोल दिया गया। महीपति तथा अन्य लोगों ने बही-खाते देखे। बही-खाते सचमुच ही तैयार थे। यह देखकर वहाँ उपस्थित सभी लोग दाँतों तले अंगुली दबाने लगे।
तब तक पेशवा को किसी ने सारी स्थिति से अवगत करा दिया था कि काम बहुत अधिक है, तीन दिन में किसी तरह भी पूरा नहीं हो सकता। उसे पूरा करने के लिए कम से कम एक महीना चाहिए। फिर उसने ज्योति पंत वाली सारी बात भी बता दी कि उसने तीन दिन में बही-खाते पूरे कर देने का विश्वास महीपति को दिलाया है। सारी बात सुनकर पेशवा ने पहले तो महीपति को बुलाने का विचार किया, परन्तु फिर यह सोचकर अपना विचार बदल दिया कि देखें! ज्योति पंत क्या करता है?
चौथे दिन महीपति ने बही-खाते पेशवा के सामने प्रस्तुत किये। जाँच करने के लिए पेशवा ने खाते खोले। अक्षर देखकर पेशवा आश्चर्यचकित रह गया, क्योंकि अक्षर इतने अधिक सुन्दर थे कि आजतक इतने सुन्दर अक्षर उसने न देखे थे। उसने महीपति से कहा-""ये बही-खाते किसने तैयार किये हैं, उसे मेरे सामने उपस्थित करो।'' महीपति ने तुरन्त ज्योतिपंत को बुलवाया और पेशवा को उसका परिचय देते हुए बताया कि यह मेरा भाँजा है। पेशवा ने ज्योतिपंत से पूछा-""इतना सारा काम तुमने तीन दिन में कैसे पूरा किया? फिर अक्षर भी इतने सुन्दर हैं कि देखते ही बनते हैं।'' ज्योतिपंत ने कुछ नहीं छिपाया, सारी बातें सच-सच बता दीं कि यह सब गणेश जी की कृपा से ही सम्भव हुआ है। यह भी बता दिया कि गणेश जी की कृपा से ही उन्हें सब विद्यायें भी प्राप्त हुई हैं। ज्योतिपंत पर गणेश जी की इतनी कृपा देखकर पेशवा बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने ज्योति पंत का बड़ा आदर-सम्मान किया और अपने हाथ से राजकीय मुहर और अधिकार की पोशाक देकर उन्हें पुरन्दरपुर के किले की रक्षा का भार सौंप दिया। अब ज्योति पंत का सम्मान महीपति से भी अधिक बढ़ गया। वे पुरन्दरपुर के किले में चले गए। किन्तु कुछ ही दिनों के पश्चात् उन्हें स्वप्न में गणेश जी ने दर्शन देकर कहा-""अब भगवान की विशेष दया तुम पर उतरने वाली है, इसलिये तुम काशी चले जाओ।'' प्रातः होते ही ज्योति पंत ने सर्वप्रथम कार्य यह किया कि अपने पद से त्यागपत्र दे दिया और पेशवा की नौकरी से सदा के लिए छुट्टी ले ली और काशी की ओर चल पड़े।
ज्योति पंत काशी पहुंचे। वहां दूसरे दिन वे मणिकणिका घाट पर गंगा जी में खड़े हुए मंत्र जप कर रहे थे कि एक व्यक्ति ने उनके निकट पहुँचकर उन पर जल उछाला। ज्योति पंत ने देखा कि एक मलेच्छ उन पर जल उछाल रहा है तो वे बड़े कुपित हुए। उन्होंने यह सोचकर कि यह मलेच्छ ने उनपर जल उछालकर उन्हें भ्रष्ट कर दिया है, गंगा जी में पुनः डुबकी लगाई और फिर जप करने लगे। उस व्यक्ति ने उनपर पुनः जल उछाल दिया। ज्योति पंत क्रोध में आकर बड़बड़ाने लगे। यह देखकर वह व्यक्ति हँसने लगा। ज्योति पंत ने उससे हँसने का कारण पूछा, तो उसने कहा-""गंगा जी तो सबको पवित्र करने वाली हैं, इसीलिये शास्त्रों ने उनकी इतनी महिमा गाई गई है, फिर क्या गंगा जी में स्नान करके मैं पवित्र नहीं हो गया? तुम्हारे ऊपर भी तो मैने गंगाजल ही उछाला है, तो क्या गंगा जल के छींटें पड़ने से तुम अपवित्र हो गए? सबको पुनीत करने वाली पतितपावनी गंगा जी क्या मेरे स्पर्श से स्वयं अपवित्र हो गर्इं? गंगा जी के लिए तो कहा गया है किः-
योजनानां सहरुोषु गंगां स्मरति यो नरः।
अपि दुष्कृतर्मासौ लभते परमां गतिम्।।
कीर्तनान्मुच्यते पापैर्दृष्ट्वा भद्राणि पश्यति।
अवगाह्र च पीत्वा च पुनात्यासप्तमं कुलं।।
पदमपुराण
अर्थ-ः ""जो मनुष्य सहरुाों योजन दूर से भी गंगा जी का स्मरण करता है, वह पापाचारी होने पर भी परमगति को प्राप्त होता है। मनुष्य गंगा जी का नाम लेने से पाप मुक्त होता है, दर्शन करने से कल्याण का दर्शन करता है तथा स्नान करने से और जल पीने से अपने कुल की सात पीढ़ियों को पवित्र कर देता है।'' गंगा जी की ऐसी जो महिमा लिखी गई है तो क्या यह कथन असत्य है? फिर तुम क्या सोचकर गंगा जी में स्नान कर रहे हो? मेरे इन सब प्रश्नों का उत्तर दो। मेरे एक अन्य प्रश्न का भी उत्तर दे दो। ऐसा कहा जाता है कि सम्पूर्ण
प्राणियों में उस परमात्मा की ही ज्योति विराजमान् है जैसा कि श्वेताश्वतर उपनिषद् में वर्णन किया गया हैः-
एको देवः सर्वभुतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।
कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च।। 6/11
अर्थः-वह एक देव ही समस्त प्राणियों में छिपा हुआ, सर्वव्यापी और समस्त प्राणियों का अन्तर्यामी परमात्मा है। वही सबके कर्मों का अधिष्ठाता, सम्पूर्ण भूतों का निवास-स्थान, सब का साक्षी, चेतन स्वरुप एवं सबको चेतना प्रदान करने वाला, सर्वथा विशुद्ध और गुणातीत है। तो क्या महापुरुषों का यह कथन भी असत्य है? क्या मलेच्छ में भी वही ज्योति विराजमान नहीं है?''
अब तो ज्योति पंत को सन्देह हुआ। उसने प्रश्न किया-""सच-सच बतायें, आप कौन हैं?'' उस व्यक्ति ने कहा-""मैं वही हूं जिसकी खोज में तुम यहाँ आए हो?''
यह कहकर सन्त श्री व्यासदेव जी गंगा जी से बाहर आ गए और उन्होंने मलेच्छ वाले वस्त्र उतार दिये। ज्योतिपंत भी गंगा जी से बाहर आए और श्री व्यासदेव जी के चरणों में गिर पड़े और अपने अपराध के लिए क्षमा मांगने लगे। श्री व्यासदेव जी ने उन्हें उठाया और अपने आश्रम पर ले गये। और उन्हें तत्त्वज्ञान का उपदेश दिया। तत्पश्चात् श्री व्यासदेव जी ने कहा-""तुम्हारी इच्छा थी कि तुम्हें भगवान की प्रेमस्वरुपा भक्ति प्राप्त हो, वह तुम्हें प्राप्त होगी। तुम नित्यप्रति श्रीमद्भागवत की कथा किया करो और भक्तों को भगवान की लीलायें सुनाया करो।''
गुरुदेव की आज्ञा शिरोधार्य कर वे नित्यप्रति श्रीमद्भागवत की कथा कहने लगे। उनके स्वर में मधुरता थी और कथा करते-करते वे प्रेम-विभोर हो जाया करते थे, अतः कथा श्रवण करने के लिये भक्तों की भीड़ लग जाती। कुछ काल के बाद गुरुदेव की आज्ञा से ज्योति पंत महाराष्ट्र वापस लौट गए और जगह-जगह भ्रमण कर भक्ति का प्रचार करने लगे। उन्होंने भक्ति, ज्ञान और वैराग्य सम्बन्धी अनेकों पदों की मराठी भाषा में रचना की। उनके ये पद बड़े ही लोकप्रिय हैं और भक्त लोग बड़े प्रेम से इन्हें गाते हैं। इस प्रकार ज्योति पंत ने अपना लोक-परलोक तो सँवारा ही, अनेकों लोगों को भी प्रेरणा देकर भक्ति-परमार्थ के पथ पर लगाया और सदा सर्वदा के लिए अपना नाम अमर कर गए।
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