Wednesday, January 6, 2016

महर्षि ऋभु तथा निदाघ



महर्षि ऋभु के विषय में ऐसा माना जाता है कि वे ब्राहृा जी के मानस-पुत्र थे। उन्होंने पूर्ण तत्त्ववेत्ता अपने ज्येष्ठ भ्राता सनत्सुजात का शिष्यत्व ग्रहण किया और अत्यन्त श्रद्धा, निष्ठा एवं प्रेम से उनकी सेवा की। उनसे आत्मज्ञान की प्राप्ति करके वे सदा आत्मिक स्थिति में अवस्थित रहने लगे। कुछ समय के उपरान्त उन्होंने एक स्थान पर रहने की अपेक्षा भ्रमण करने का विचार किया। भ्रमण करते हुए वे एक दिन उस ओर जा निकले, जहाँ पुलस्त्य ऋषि का आश्रम था। उस समय वहाँ पुलस्त्य ऋषि का पुत्र निदाघ वेदाध्ययन कर रहा था। महर्षि ऋभु को देखकर निदाघ तुरन्त अपने स्थान से उठ खड़ा हुआ, आगे बढ़कर अत्यन्त श्रद्धा से उन्हें प्रणाम किया, तत्पश्चात् आसन पर विराजमान होने के लिए विनय की। उसे संस्कारी एवं अधिकारी जानकर महर्षि ऋभु ने प्रसन्न होकर उसे आशीर्वाद दिया और बोले-केवल सद्ग्रन्थों को कण्ठस्थ कर लेने से ही जीवन का उद्देश्य पूरा नहीं हो जाता। जीवन का वास्तविक उद्देश्य तो आत्मज्ञान की प्राप्त करके आवागमन के चक्र से मुक्ति प्राप्त करना है। आत्मज्ञान की प्राप्ति पूर्ण तत्त्वेत्ता सद्गुरु की कृपा से ही सम्भव है। आत्मज्ञान के बिना सभी ज्ञान थोथे हैं, परन्तु आत्मज्ञान की प्राप्ति यदि हो जाये तो फिर समझ लो कि सब कुछ जान लिया।
जो यह एक न जानिया, तो बहु जाने का होय।
एकै  तें  सब  होत  है , सब तें एक न होय।।
महर्षि ऋभु की प्रेरणा से निदाघ के ह्मदय में आत्मतत्त्व को जाने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई। महर्षि के शरणागत होकर वह उनके साथ भ्रमण करते हुए हित्तचित्त एवं श्रद्धा से उनकी सेवा करने लगा। उसकी सेवा से महर्षि ऋभु प्रसन्न हो गए। उन्होंने उसे आत्मज्ञान का उपदेश देकर घर वापस जाने का आदेश दिया। गुरुदेव की आज्ञा शिरोधार्य कर निदाघ अपने घर वापस चला गया। कुछ दिन के उपरांत उसके पिता पुलस्त्य ऋषि ने उसका विवाह कर दिया। अपने पिता के आश्रम से कुछ दूरी पर एक कुटिया बनाकर निदाघ अपनी पत्नी के साथ वहीं रहने लगा। शनैः शनैः वह पूरी तरह माया के चक्कर में फँस गया और गुरुदेव के उपदेश को भूल गया। महापुरुषों में यह विशेष गुण होता है कि जो एक बार उनकी शरण ग्रहण कर लेता है, महापुरुष सदा के लिए उसके ज़िम्मेवार बन जाते हैं। वे सदैव ही उसे माया से बचाते हैं।
कबीर माया मोहिनी , सब जग घाला घानि।
सतगुरु की किरपा भई, नातर करती हानि।।
भली भई  जो  गुरु मिले , नातर होती हान।
दीपक जोति पतंग ज्यों, परता आय निदान।।
     निदाघ जब गुरु के उपदेश को भूलकर माया में लिप्त हो गया, तो उसे सचेत और सावधान करने के लिए महर्षि ऋभु वेष बदल कर उसकी कुटिया पर जा पहुँचे। निदाघ ने, जो अब गृहस्थी बन चुका था, गृहस्थ-धर्म के अनुसार उनका आदर-सत्कार कर उन्हें भोजन कराया। महर्षि ऋभु के भोजन कर चुकने पर निदाघ ने कहा-ऋषिदेव! आपका निवास स्थान कहाँ है? इस समय आप कहाँ से आ रहे हैं और कहाँ जाने का आपका विचार है? क्या भोजन से आपकी भूख की निवृत्ति हुई? क्या आप पूर्णतया तृप्त हो गये?
     निदाघ के इस प्रकार प्रश्न करने पर महर्षि ऋभु ने हँसते हुए कहा-तुमने मेरे निवास और आने-जाने के विषय में पूछा, सो आता-जाता तो शरीर है और मैं शरीर नहीं, आत्मा हूँ, आत्मा तो सर्वव्यापक है, हर जगह विद्यमान है, इसलिए उसका कहीं आना-जाना नहीं होता। इसलिए वत्स! आकाश की तरह सर्वव्यापक होने से मैं सब जगह विद्यमान हूँ, न कहीं आता हूँ और न ही कहीं जाता हूँ, भूख-प्यास के विषय में तुमने पूछा, सो भूख-प्यास भी शरीर को लगती है। मैं चूँकि शरीर नहीं हूँ। इसलिए मुझे भूख-प्यास लगने का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। रही तृप्त होने की बात, सो तृप्ति एवं अतृप्ति तो मन के धर्म हैं, मेरा उनसे कोई सम्बन्ध नहीं। फिर तृप्ति अतृप्ति के हेतु संसार के सभी रस परिवर्तनशील एवं अस्थायी है। मन का स्वभाव भी पल-पल बदलता रहता है। कभी रुचिकर पदार्थ भी मनुष्य को अरुचिकर प्रतीत होने के कारण उसे तृप्त नहीं कर सकते और कभी ऐसा भी होता है कि अरुचिकर पदार्थ भी उसके लिए तृप्तिकारक बन जाते हैं। इसलिए इन परिवर्तनशील एवं विषम स्वभाव वाले सांसारिक अथवा मायिक रसों पर कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिए। आम संसारी मनुष्य माया के चक्र में पड़कर और स्वयं को शरीर समझकर जीवनपर्यन्त इन रसों के दीवाने बने रहते हैं और अपना जीवन नष्ट कर लेते हैं। माया के चक्कर में आकर वे अपने वास्विक स्वरुप को सदैव भूले रहते हैं। किन्तु निदाघ! तुम माया के चक्कर में पड़कर अपने वास्तविक स्वरुप को मत भूलो।
     ये वचन सुनकर निदाघ उनके चरणों में गिर पड़ा। तब महर्षि ऋभु ने स्वयं को उसके सामने प्रकट कर दिया। गुरुदेव के दर्शन कर निदाघ अत्यन्त प्रसन्न हुआ। महर्षि ऋभु उसे पुनः उपदेश देकर अन्यत्र चले गये। कुछ दिनों के उपरान्त महर्षि ऋभु पुनः वेष बदल कर निदाघ के पास गये। संयोगवश उस समय वहाँ से राजा की सवारी निकल रही थी जिस कारण लोगों की वहाँ भीड़ लगी थी। निदाघ भी वहीं एक स्थान पर खड़ा था। महर्षि ऋभु उसके निकट जाकर खड़े हो गए,फिर पूछा-यहाँ भीड़ क्यों लगी है? निदाघ ने उनकी ओर दृष्टि उठाकर देखा, परन्तु उन्हें पहचान न सका। उसने उत्तर दिया-सामने देखो! राजा की सवारी निकल रही है, उसे देखने के लिए ही यहाँ लोग जमा हैं।
     महर्षि ऋभु ने पूछा-इनमें राजा कौन है? निदाघ ने उत्तर दिया-वह जो विशालकाय हाथी के ऊपर सवार है, वही राजा है। महर्षि ऋभु ने कहा-ऊपर और नीचे से तुम्हारा क्या अभिप्राय है, मुझे अच्छी तरह समझाकर बताओ। यह सुनकर निदाघ चिढ़ गया। वह तुरन्त महर्षि की पीठ पर सवार हो गया और बोला-मैं राजा की भाँति ऊपर हूँ और आप हाथी की भाँति नीचे हैं। महर्षि ने हँसते हुए कहा-यह तो ठीक है कि तुम राजा की भाँति ऊपर हो और मैं हाथी की भाँति नीचे हूँ, परन्तु तुम कौन हो और मैं कौन हूँ?
     ये शब्द सुनते ही निदाघ चौंक उठा। वह झट महर्षि ऋभु की पीठ से उतरकर उनके चरणों में गिर पड़ा और रोकर विनय करने लगा-आप अवश्य ही मेरे गुरुदेव हैं, जो बार-बार मुझे उपदेश देकर सन्मार्ग दर्शाते हैं। प्रभो! मैंने अनजाने में आपके प्रति बड़ा भारी अपराध किया है, आप कृपालु हैं, क्षमाशील हैं, मेरा अपराध क्षमा करें।
   सन्त महापुरुष स्वभाव से ही क्षमाशील, दया के सागर एवं करुणा के अवतार होते हैं। कथन हैः-
सद कृपाल दुख परिहरन, वैर भाव नहिं कोय।
छिमा ज्ञान सत भाखहीं, हिंसा रहित जो होय।
     महर्षि ऋभु ने निदाघ को क्षमा कर दिया और पुनः आत्मतत्त्व का उपदेश किया। उनकी कृपा से निदाघ आत्मज्ञान प्राप्त कर अपनी सहज अवस्था में अवस्थित हो गया।
     महापुरुषों की यह कितनी महान कृपा होती है कि वे बार-बार अपने हितकारी एवं मंगलमय उपदेशों द्वारा जीव को वास्तविकता का बोध कराते हैं, आज भी करा रहे हैं। जब उनकी हम जीवों पर इतनी कृपा है और वे अपने पावन तन पर कष्ट सहन कर दिन-रात हमारे आत्म कल्याण के कार्य में संलग्न हैं, तो फिर हमारा भी कर्तव्य हो जाता है कि उनकी चरण-शरण ग्रहण कर उनसे आत्मज्ञान की प्राप्ति करें और अपनी आत्मा का कल्याण करके अपना जन्म सफल एवं सकार्थ करें।

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