भक्त अंगदसिंह जी
परमसंत श्री कबीर साहिब जी के वचन हैंः-
भक्ति प्राण ते होत है, मन दै कीजै भाव।
परमारथ परतीत में, यह तन जाव तो जाव।।
प्राचीन समय की बात है, भारतवर्ष के मध्यभारत के क्षेत्र में एक छोटा सा राज्य था जिसका नाम था-सैनगढ़। जिस समय की हम यह कथा लिखने जा रहे हैं, उन दिनों उस राज्य पर राजा दीनसलाह सिंह का शासन था। अंगदसिंह उन्हीं राजा दीनसलाह सिंह के भतीजे थे, जिन्होंने अभी यौवन अवस्था में पग रखा था। अंगदसिंह शारीरिक-रुप से बलिष्ठ तो थे ही, बुद्धिमान्, निर्भीक, साहसी और देशभक्त भी थे। इन गुणों के कारण राजा दीनसलाहसिंह अपने भतीजे को बहुत चाहते थे। अंगदसिंह भी अपने चाचा का बहुत आदर करते थे और उनके हर आदेश का पालन करने को सदा तत्पर रहते थे। विचारवानों का कथन है किः-
है गुण अवगुण सब विषे, इन बिन जंतु न कोई।
(सारुक्तावलि)
अंगदसिंह में भी जहाँ इतने सारे गुण विद्यमान थे, वहाँ कुछ अवगुण भी मौजूद थे। राज-परिवार से सम्बन्धित होने के कारण धन-धान्य की तो कोई कमी थी नहीं, फिर यौवनावस्था भी थी, इस पर सुसंगति की बजाय मिल गई कुसंगति, फल यह हुआ कि वे अत्यन्त विलास-प्रिय और ऐय्याश बन गये थे तथा खेल-तमाशे, आमोद-प्रमोद और नाच-गाने आदि में ही अपना अधिकतर समय व्यतीत करने लग गये थे। अर्थात् कुसंगति का रंग उनपर पूरी तरह चढ़ गया था। अपनी इस कुमित्र-मण्डली के साथ सारा दिन बिताकर वे रात देर गए घर वापस आते, परन्तु दशा यह होती कि नशे में पूरी तरह चूर होते।
अंगदसिंह के माता-पिता परलोक सिधार चुके थे। राजा दीनसलाहसिंह के कोई सन्तान नहीं थी, इसलिए अंगदसिंह ही उनके राज्य के उत्तराधिकारी थे। राजा को अंगदसिंह की यह कुमित्र मण्डली और उनकी ये आदतें बिल्कुल अच्छी न लगती थीं। अतः उन्होंने यह सोचकर अंगदसिंह का विवाह कर दिया कि जब वह पत्नी की ओर आकर्षित हो जायेंगे तो कुमित्र-मण्डली का आकर्षण स्वयमेव ही कम हो जायेगा और वे अपने आप ही सुधर जायेंगे।
अंगदसिंह की पत्नी बड़ी ही भक्तिभावसम्पन्न, सन्त-सेवा, सुशील स्वभाव की, मृदुभाषी तथा पतिव्रता थी। उसके माता-पिता बड़े ही भक्तिभाव वाले और साधु प्रकृति के थे तथा पूर्ण सद्गुरु से उन्हें नाम की दात भी मिली हुई थी। उनके घर प्रायः सत्संग होता रहता था। इस प्रकार अंगदसिंह की धर्म-पत्नी को बाल्यकाल से ही सत्संगति का सुअवसर मिलता रहा था जिससे उसके अन्दर भक्ति के विचार काफी सुदृढ़ हो गये थे। प्रभु-भक्त और प्रभु-प्रेम का उस पर गहरा रंग चढ़ा हुआ था।
अंगदसिंह की दिनचर्या देखकर पहले तो उनकी धर्मपत्नी को बड़ा आघात लगा, परन्तु वह शीघ्र ही संभल गई। उसने अपने व्यवहार से यह बात बिल्कुल भी न प्रकट होने दी कि उसे पति की आदतें पसन्द नहीं हैं, न ही उसने कभी अपने पति से उनके आचरण के लिए शिकायत की। वह चुपचाप अपने पतिव्रत धर्म का पालन करते हुए दिन व्यतीत करने लगी। जब तक अंगदसिंह घर पर रहते, वह उनकी हर तरह से सेवा करती और मधुर शब्दों में संभाषण करती। उसके इस प्रकार के व्यवहार का परिणाम यह हुआ कि अंगदसिंह के ह्मदय में उसने अपना स्थान बना लिया। अंगदसिंह उसकी प्रत्येक बात को पूरा करने और उसे हर तरह से प्रसन्न रखने का प्रयास करते। उनके मन में कई बार यह विचार उठता कि आमोद-प्रमोद और रंग-रलियों की महफिलों में
आना-जाना छोड़ दें, परन्तु कुमित्रों के आते ही वह विचार पूरी तरह दब जाता और वे उनके साथ चल पड़ते।
यह देखकर उनकी धर्मपत्नी मन ही मन अत्यन्त दुःखी होती और भगवान के चरणों में घंटों इस बात के लिए प्रार्थना करती कि भगवान उसके पति पर अपनी कृपादृष्टि डालें और उन्हें कुमार्ग से हटाकर सन्मार्ग पर लगायें। भगवान उन्हें ऐसी सुमति दें कि कुसंगति के गंदले तालाब में विषयों की मछलियाँ पकड़ने की अपेक्षा वे सुसंगति के मान-सरोवर में मज्जन करें और नाम भक्ति के मुक्ता चुग-चुगकर खायें। अन्ततः उसकी सच्चे मन से की गई पुकार रंग लाई और भगवान ने अंगदसिंह के जीवन में परिवर्तन लाने का सब प्रबन्ध कर दिया। किसी भी कार्य के लिये यदि ह्मदय की गहराइयों से भगवान के चरणों में प्रार्थना की जाए तो वह प्रार्थना कभी निष्फल नहीं जाती। अंगदसिंह के जीवन सुधार के लिए उसकी धर्मपत्नी द्वारा की गई प्रार्थनाओं के फलीभूत होने का भी समय आ गया।
हुआ यह कि एक दिन अंगदसिंह की धर्मपत्नी के गुरुदेव अकस्मात् उसके घर आ गए। गुरुदेव के दर्शन करके उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। उसने तुरन्त आंगन में उनके लिए पलंग तैयार किया और गरुदेव उस पर विराजमान हो गए। आज्ञा पाकर वह भी धरती पर बैठ गई। नौकर-चाकर भी एकत्र हो गए और उसका संकेत पाकर वहीं धरती पर बैठ गए।
उस दिन अंगदसिंह भी सायंकाल होते ही घर लौट आए। घर में प्रवेश करते ही उन्होंने क्या देखा कि आंगन में एक तेजस्वी सन्त पलंग पर विराजमान हैं और उनकी धर्मपत्नी उनके सम्मुख दोनों हाथ जोड़े धरती पर बैठी है। सारे नौकर-चाकर भी वहीं बैठे हैं। सन्त कुछ कह रहे हैं और सभी उसे सुनने में मग्न हैं। अंगदसिंह तो विलासप्रिय व्यक्ति थे, उन्हें भला इन कार्यों से क्या रुचि हो सकती थी। दूसरे, अपनी पत्नी का जोकि भविष्य में उस राज्य की होनेवाली रानी थी, इस प्रकार किसी साधु-सन्त के सामने हाथ जोड़कर बैठना बिल्कुल अच्छा न लगा। वे यह सब देखकर झल्ला उठे। किन्तु जैसा कि पहले लिखा जा चुका है कि अंगदसिंह की धर्मपत्नी ने अपने व्यवहार से उनके दिल में काफी जगह बना ली थी और अंगदसिंह उसे बहुत चाहने लगे थे; फलस्वरुप वे हर समय इसी प्रयास में रहते थे कि उनकी पत्नी सदा प्रसन्न रहे और कभी कोई ऐसी बात न हो जिससे कि दोनों में एक-दूसरे के प्रति कटुता उत्पन्न हो। उस समय भी वहां सन्तों को बैठे देखकर पहले तो वे क्रोध से तिलमिला उठे, फिर न जाने क्या सोचकर वे बड़बड़ाते हुए अपने कमरे में चले गए। न ही निकट आए और न ही सन्तों को प्रणाम किया।
अंगदसिंह की पत्नी अब तक सब कुछ सहन करती आई थी, परन्तु अंगदसिंह के आज के इस अविनययुक्त और अनीति पूर्ण व्यवहार से उसे गहरा आघात पहुँचा। उसके गुरुदेव तो पूर्ण महापुरुष थे जो मान-अपमान, स्तुति-निंदा तथा हर्ष-शोक आदि से बहुत ऊपर उठ चुके थे। ऐसे संत महापुरुषों के लिए ही गुरुवाणी में फरमान हैकिः-
सुखु दुखु जिह परसै नहीं लोभ मोह अभिमानु।
कहु नानक सुन रे मना सो मूरति भगवान।।
उसतति निंदिआ नाहि जिहि कंचन लोह समानि।
कहु नानक सुनु रे मना मुकति ताहि तै जानि।
हरख सोग जा कै नहीं वैरी मीत समान।
कहु नानक सुनि रे मना मुक्ति ताहि तै जानि।।
अस्तु, मान-सम्मान और हर्ष-शोक आदि को समान समझनेवाले गुरुदेव अंगदसिंह के व्यवहार से तनिक भी उद्विग्न न हुए, हाँ! उन्होंने यह अवश्य जान लिया कि घर के स्वामी के ह्मदय में साधु-सन्तों के लिए तनिक भी
आदरभाव नहीं है। ऐसा जानकर उन्होंने वहाँ अब अधिक देर रुकना उचित न समझा। वे तुरन्त उठ खड़े हुए और चलने को तैयार हो गए। अंगदसिंह की पत्नी ने उन्हें रोकने का बहुत प्रयास किया, रुकने के लिये बार-बार प्रार्थना की, परन्तु गुरुदेव यह कहते हुए वहाँ से चले गए कि इस समय हम जल्दी में हैं, फिर कभी आयेंगे।
गुरुदेव के प्रति अंगदसिंह के अनुचित एवं अविनययुक्त व्यवहार से उसकी पत्नी को गहरा आघात तो लगा ही था, परन्तु अब गुरुदेव के वहां से चले जाने पर तो मानो उस पर पहाड़ टूट पड़ा। वह मूÐच्छत होकर वहीं गिर पड़ी। सेवक और सेविकायें तो वहां उपस्थित ही थे, कुछ ने दौड़कर अंगदसिंह को सूचना दी। सेविकायें उसे उठाकर उसके कमरे में ले गर्इं और उसे होश में लाने का प्रयास करने लगीं। काफी देर बाद जब उसे होश आया और उसने आँखें खोलीं तो सामने अंगदसिंह को देखकर उसने पुनः आँखें मूँद लीं और करवट लेकर पड़ गई। अंगदसिंह ने एक-दो बार उसे आवाज़ दी, परन्तु जब उसकी ओर से कोई उत्तर न मिला तो उसने सोचा-चलो! इसे होश तो आ ही गया है, कुछ देर आराम कर लेगी तो स्वस्थ हो जायेगी। यह सोचकर उन्होंने सबको उसका पूरा-पूरा ध्यान रखने का आदेश दिया और स्वयं अपने कमरे में चले गये।
कुछ समय के पश्चात् दासियाँ जब अंगदसिंह की पत्नी के लिए भोजन लेकर गई तो उसने भोजन करने से इनकार कर दिया और उन सबसे कह दिया कि न कोई मेरे निकट आये और न ही कोई मुझे बुलाने का प्रयत्न करे। दासियों ने अंगदसिंह को सब समाचार दिया। अंगदसिंह अपनी पत्नी के कमरे में गए। वह द्वार की ओर पीठ करके लेटी हुई थी और उसकी आँखों से आँसूं बह रहे थे। अंगदसिंह ने तीन चार बार उसे आवाज़ दी, परन्तु उसकी ओर से कोई उत्तर न मिलने पर वे यह बड़बड़ाते हुए अपने कमरे में वापस चले गये कि भोजन करती है तो करे, नहीं तो पड़ी रहे मरने के लिये।
इसी प्रकार चार दिन बीत गये। अंगदसिंह की पत्नी ने भोजन करना तो दूर रहा, इन चार दिनों में जल की एक बूंद तक ग्रहण न की। रोते-रोते उसकी आँखें सूज गर्इं। उसकी हालत बिगड़नी शुरु हो गई। राजा दीनसलाहसिंह को पता चला तो उसने आकर समझाया, रिश्तेदारों और सम्बन्धियों ने आकर समझाया, परन्तु वह आँखे बन्द किये चुपचाप उसी प्रकार लेटी रही। धीरे-धीरे यह बात पूरे नगर में फैल गई कि अंगदसिंह की पत्नी ने इसलिये अन्न-जल का त्याग किया है क्योंकि उसके गुरुदेव का अंगदसिंह ने अपमान किया है। सारा नगर अंगदसिंह को दोष देने लगा।
अन्ततः अंगदसिंह पाँचवे दिन दोपहर को एकान्त होने पर अपनी पत्नी के कमरे में गए। वह उसी तरह गुम-सुम पलंग पर लेटी हुई थी। अंगदसिंह ने धीरे से उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया और बोले-मैने तुम्हारे दिल को बहुत ठेस पहुँचाई है। मैं अपने किये पर बहुत लज्जित हूँ। अब तुम जैसा कहोगी, मैं वैसा ही करूँगा। उठो, और कुछ खा-पी लो। अंगदसिंह की पत्नी ने जब ये शब्द सुने, तो पहले तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ, फिर सोचने लगी-क्या भगवान ने मेरी प्रार्थना सुन ली है? क्या इनके सुधरने का समय आ गया है? लगता है कि भगवान ने सचमुच ही मेरी पुकार सुन ली है। अन्यथा ये इस प्रकार के शब्द क्यों कहने लगे? यह सोचकर वह भगवान के प्रति कृतज्ञता से भर गई। उसकी आँखों से पुनः अश्रुधारा प्रवाहित होने लगी। रोते-रोते वह बोली-आपने जो उस दिन मेरे गुरुदेव का अपमान किया, उसी से मेरे ह्मदय को ठेस पहुँची है, क्योंकि गुरुदेव तो परब्राहृ परमेश्वर का अवतार होते हैं। आपने उनका अनादर नहीं किया, अपितु सर्वेश्वर परमात्मा का अनादर किया है। इससे जघन्य पाप संसार में भला और क्या हो सकता है? आप कुसंगति में पड़कर जो कुछ भी अनुचित कर्म करते रहे, मैने उस पर कभी अंगुली नहीं उठायी; चुपचाप उन्हें सहन करती रही। किन्तु गुरुदेव का अपमान मेरी आँखों के सामने हो, यह मेरी आत्मा कभी सहन नहीं कर सकती। इसलिए अच्छा
यही है इस अपराध के प्रायश्चितस्वरुप मैं अपने प्राण त्याग दूँ।
यह सुनकर अंगदसिंह व्याकुल हो उठे और बोले-ऐसा मत कहो। मैं अभी तुम्हारे गुरुदेव के पास जाता हूँ और उनसे अपने अपराध के लिए क्षमा माँगता हूँ।अब उठो और कुछ खाओ -पीओ ताकि मुझे कुछ तसल्ली हो। अंगदसिंह की पत्नी ने कहा-जब तक गुरुदेव से क्षमा याचना करके और उन्हें मनाकर आप घर नहीं लायेंगे और साथ ही यह प्रतिज्ञा नहीं करेंगे कि भविष्य में आप किसी भी साधु-सन्त का न तो अनादर करेंगे और न ही उन्हें घृणा की दृष्टि से देखेंगे तब तक मैं जल भी ग्रहण नहीं करुँगी,यह मेरा प्रण है।
अंगदसिंह ने उसके सामने प्रतिज्ञा करते हुए कहा-जो कुछ हुआ सो हुआ। अब भविष्य में मुझसे कभी ऐसा अपराध नहीं होगा। मैं अभी जाकर गुरुदेव से क्षमा की भिक्षा मांगता हूँ और उन्हें मनाकर आदर-सहित यहां लाता हूँ। साथ ही मैं यह प्रतीज्ञा करता हूँ कि आज से कुसंगति का पूरी तरह परित्याग करके मैं जीवन का शेष समय सत्संगति और प्रभु के सुमिरण-भजन में व्यतीत करूंगा। अंगदसिंह के ये शब्द सुनकर उनकी पत्नी को अत्यन्त प्रसन्नता हुई और भगवान की इस असीम अनुकम्पा के लिए उन्हें बार बार मन ही मन धन्यवाद देने लगी और अपनी कृतज्ञता प्रकट करने लगी। यही तो वह मन से चाहती थी कि अंगदसिंह दुष्टमण्डली को छोड़कर सत्संगति और भजन-सुमिरण में अपना समय व्यतीत करें। आज उसकी यह इच्छा पूरी हो रही थी, इसलिए भगवान की कृपा का अनुभव कर आज वह बहुत प्रसन्न थी।
अंगदसिंह उसी समय गुरुदेव के आश्रम पर पहुँचे और जाते ही उनके चरणों में गिर पड़े और अपने अपराध के लिए क्षमा याचना करने लगे। सन्त महापुरुष किसी से रुष्ट ही कब होते हैं? वे तो करुणा, दया और क्षमा के अवतार होते हैं और जीवों के कल्याण के लिए सब कुछ सहन करते हैं। गुरुदेव ने अंगदसिंह को क्षमा कर दिया और उनकी प्रार्थना पर उनके घर चले गए। वहीं पर अंगदसिंह ने गुरुदेव से नाम-दीक्षा ले ली और उस दिन से अपना अधिकतर समय नाम-सुमिरण,भजन-ध्यान और सन्तों की सेवा में व्यतीत करने लगे। वे भगवान श्रीकृष्ण के उपासक थे। कुछ ही दिनों में उनकी दशा यह हो गई कि वे भगवान के श्री दर्शन के लिए उसी प्रकार छटपटाने लगे जिस प्रकार ग्रीष्मऋतु में मरुस्थल की तपती रेत में प्यास से व्याकुल हिरण एक घूँट जल के लिए छटपटाने लगता है। किन्तु दर्शन देने से पूर्व भगवान अपने भक्त की भक्ति में दृढ़ता देखते हैं। यह देखते हैं कि भक्त ने दृढ़ता से उनका ओट-आसरा पकड़ा है या नहीं। अगंदसिंह जी की परीक्षा का समय भी आ गया। उस समय के बादशाह को जब इस बात का पता चला कि सैनगढ़ पर एक वृद्ध राजा शासन कर रहा है तो उसने राज्य को अपने अधीन करने का विचार कर अपने सूबेदार को बुलाया और उसे सैनगढ़ पर चढ़ाई करने का आदेश दिया। राजा दीनसलाहसिंह एक तो वृद्ध था, दूसरे उसके पास इतनी अधिक सेना भी नहीं थी, इसलिए यह समाचार सुनते ही उसके होश उड़ गए। उसने तुरन्त अपने भतीजे अंगदसिंह को बुलाया और कहा-अंगद! शत्रु हमारे ऊपर एक बड़ी सेना लेकर चढ़ आया है। मेरे हाथ-पाँव तो अब शिथिल हो चुके हैं, इसलिए युद्ध कर सकना अब मेरी सामथ्र्य से बाहर है। सैनगढ़ की रक्षा और सम्मान का भार अब तुम्हारे ही हाथों में है। मै जानता हूँ कि बादशाह की सेना की तुलना में हमारी सेना बहुत ही कम है, फिर भी मुझे तुम्हारी वीरता और साहस पर पूरा-पूरा विश्वास है।
अपने चाचा दीनसलाहसिंह के ये शब्द सुनते ही अंगदसिंह की भुजायें फड़कने लगीं और हाथ बार-बार तलवार पर जाने लगा। उन्होंने कहा-चाचा जी! आप ज़रा भी न घबरायें। शत्रु-सेना चाहे हम से संख्या में कितनी ही अधिक है, परन्तु हम उस टिड्डीदल को यह दिखा देंगे कि युद्ध किसे कहते हैं? हमारी तलवारें जब बिजली की तरह युद्भूमि में कड़केंगीं तो आप इस टिड्डीदल को सिर पर पाँव रखकर भागते देखेंगे।
इस प्रकार अपने चाचा राजा दीनसलाहसिंह को तसल्ली देकर अंगदसिंह महल से बाहर आए और
सेनापति को सेना एकत्र करने का आदेश दिया। युद्ध का डंका बजा और कुछ ही देर बाद अपनी थोड़ी-सी सेना के साथ अंगदसिंह ने शत्रुसेना पर हल्ला बोल दिया। सूबेदार को ऐसी आशा बिल्कुल नहीं थी। वह तो यह सोच रहा था कि इतनी बड़ी सेना को देखकर राजा दीनसलाहसिंह आत्म समर्पण कर देगा। इसलिए वह बिल्कुल निÏश्चत था। इस अप्रत्याशित आक्रमण से पहले तो वह घबरा गया और उसकी सेना में भी खलबली मच गई परन्तु वह शीघ्र ही संभल गया और अपनी सेना में उत्साह भर कर उसने अंगदसिंह की सेना पर जवाबी हमला बोल दिया। दोनों सेनाओं में घमासान युद्ध हुआ। दोनों ओर के सैंकड़ों सैनिक हताहत हुए। अंगदसिंह और उसके सैनिकों ने वीरता के वे जौहर दिखाये कि शत्रु-सेना के पैर उखड़ गए और वह मैदान छोड़कर भाग खड़ी हुई, किन्तु सूबेदार न बच सका। अंगदसिंह ने सूबेदार का सिर काट लिया। उस समय सूबेदार ने एक मुकुट पहन रखा था जिसमें अनेकों हीरे जड़े हुए थे। उन सबके बीचों-बीच एक बहुत ही मूल्यवान हीरा भी था। उसे देखते ही अंगदसिंह के मन में विचार उठा कि यह बहुमूल्य हीरा तो भगवान के मकुट में शोभा पाने के योग्य है। यह विचार उठते ही अंगदसिंह ने वह हीरा मुकुट में से निकाल लिया। तत्पश्चात् वे अपनी बहादुर सेना केसाथ विजय का डंका बजाते हुए नगर लौटे और राजा के सामने सूबेदार का सिर और वह मुकुट रखते हुए कहा-यह सूबेदार का सिर और उसका मुकुट है। आपके आशीर्वाद से हमारी सेना विजयी हुई है। दीनसलाहसिंह बड़े प्रसन्न हुए और अंगदसिंह को गले लगा लिया। राज्य में इस विजय के उपलक्ष्य में खूब खुशियाँ मनाई गर्इं।
कुछ दिनों के बाद किसी ने राजा दीनसलाहसिंह को इस बात की शिकायत कर दी कि सूबेदार के मुकुट में एक हीरा ऐसा था जो बहुत ही मूल्यवान था, आपको मुकुट देने से पूर्व अंगदसिंह ने वह हीरा मुकुट में से निकाल लिया था। ""इतना बहुमुल्य हीरा अंगदसिंह ने मुकुट में से निकाल लिया और मेरे को बताया तक नहीं।'' यह सोचकर राजा दीनसलाहसिंह का पारा चढ़ गया। अंगदसिंह की यह बात उसे बिल्कुल पसन्द न आई। लोभ ने उसकी बुद्धि का हरण कर लिया। वह इस बात को पूरी तरह भूल गया कि अंगदसिंह के कारण ही वह आज सैनगढ़ के सिंहासन पर बैठा हुआ है। अन्यथा आज वह बादशाह के कारागृह में पड़ा होता। उसने उसी समय अंगदसिंह को बुलाया और बोला-अंगद! हमने सुना है कि सूबेदार के मुकुट में एक अत्यन्त मूल्यवान हीरा था, जिसे तुमने निकाल लिया है।
अंगदसिंह ने उत्तर दिया-आपने सही सुना है। वह हीरा भगवान के मुकुट में शोभा पाने योग्य है। मैंने यह सोचकर ही उसे निकाला है कि भगवान जगन्नाथ जी के सुन्दर मुकुट में उसे जुड़वाऊँगा। राजा दीनसलाहसिंह ने क्रोध में भरकर कहा-वह हीरा हमारे हवाले कर दो, वह हमारे मुकुट की शोभा बढ़ायेगा। अंगदसिंह ने उत्तर दिया-चाचा जी! वह हीरा तो भगवान जगन्नाथ जी के समर्पित करने का मैं निश्चय कर चुका हूँ, इसलिए वह हीरा आप मुझसे न मांगिये।
राजा दीनसलाहसिंह ने कहा-तो इसका अर्थ यह हुआ कि वह हीरा तुम हमें नहीं दोगे। अंगदसिंह ने कहा-ऐसा ही समझ लीजिए। वह भगवान का हो चुका है, इसलिए वह हीरा मैं आपको नहीं दे सकता।
राजा क्रोध से तिलमिला उठा और कड़क कर बोला-तुम्हारा यह साहस! तुम्हें हीरा हमारे हवाले करना ही होगा। यदि तुमने ऐसा न किया और अपने इस धृष्टतापूर्ण व्यवहार के लिए हमसे क्षमा न मांगी तो फिर तुम्हें ऐसा कड़ा दण्ड दिया जायेगा, जो तुम सोच भी नहीं सकते। अंगदसिंह ने बड़े ही धीरज से उत्तर दिया-आपकी जैसी इच्छा हो वैसा कीजिए, परन्तु वह हीरा तो मैं भगवान को समर्पित कर चुका हूँ। इसलिए अपने प्राण रहते किसी और को वह हीरा मैं नहीं दे सकता।
यह कहकर अंगदसिंह वहाँ से चले गए। राजा खून का घूंट पीकर रह गया। रात भर उसे नींद न आई।
वह इसी ऊहापोह में पड़ा रहा कि हीरा कैसे प्राप्त किया जाए। वह जानता था कि अंगदसिंह के सशक्त हाथों से वह हीरा प्राप्त करना असम्भव है। इसलिए उसने छल-कपट का सहारा लेने का निश्चय किया। अंगदसिंह के लिए भोजन का थाल अंगदसिंह की धर्मपत्नी स्वयं तैयार करती थी और फिर एक नौकर वह थाल अंगदसिंह के पास ले जाता था। यह नौकर बहुत समय से उनके घर काम करता था और अंगदसिंह को उसने गोद में खिलाया था। अंगदसिंह को वह बहुत चाहता था। अंगदसिंह उसका बड़ा आदर करते थे, इसलिए उनकी पत्नी भी उसका आदर-सम्मान करती थी। राजा दीनसलाहसिंह ने अंगदसिंह के उस नौकर को कुछ डरा-धमका कर और कुछ धन का लोभ देकर उनके भोजन में विष मिलाने पर राज़ी कर लिया। उसने बहकावे और लोभ में आकर वैसा ही किया और रात्रि को विष मिलाकर भोजन अंगदसिंह को परोस दिया।
अंगदसिंह का यह नियम था कि वे पहले अपने इष्टदेव को भोग लगवाते थे, तत्पश्चात् ही भोजन करते थे। उस समय भी जब थाल उनके सामने परोसा गया तो उन्होंने अपने नियम के अनुसार इष्टदेव को भोग लगवाया। यह देखकर नौकर की बुद्धि पलट गई कि देखो! एक यह है कि भक्ति-प्रेम-श्रद्ध के उच्च भावों से भरपूर हैं और एक मैं ऐसा नीच हूँ कि जिसे गोदी में खिलाया, जिसका इतने दिन नमक खाया और जो पिता की तरह मेरा आदर करता है, थोड़े से धन के लोभ में पड़कर उसी की हत्या करने पर तुला हुआ हूँ। यह तो साथ जाएगा नहीं, परन्तु इस पाप का फल तो मुझे भोगना ही पड़ेगा।
ह्मदय परिवर्तन होते ही उसने अंगदसिंह के पैर पकड़ लिए और बोला-मालिक! यह भोजन न करें, इसमें विष मिला हुआ है। मैं राजा के बहकावे में आ गया था, इसलिये मुझसे यह घोर अपराध हो गया। मुझे क्षमा कर दें। अंगदसिंह ने सुना तो हक्के-बक्के रह गए, फिर कुछ संभलकर बोले-मैने तुम्हें क्षमा कर दिया। भगवान ने तुम्हें सद्बुद्धि दी, यह उनकी तुम्हारे ऊपर अत्यन्त कृपा है अन्यथा तुम हत्या के दोषी हो जाते। उनकी इस कृपा को याद करके उनका भजन-ध्यान किया करो। रही भोजन की बात, सो इस भोजन को तो भगवान का भोग लग चुका है, इसलिए मेरे लिए तो यह अब विषमय भोजन नहीं, अमृतरुप प्रसाद है। भगवान का यह प्रसाद तो मैं अब अवश्य ही ग्रहण करुँगा।
यह कहकर उन्होंने नौकर के बार-बार मना करने पर भी भोजन करना शुरु कर दिया। यह देखकर नौकर दौड़ा हुआ अंगदसिंह की पत्नी के पास गया और उससे बोला-आप अंगद सिंह जी को भोजन करने से तुरन्त रोकें। उसमें विष मिला हुआ है। अंगदसिंह की पत्नी ने कहा-उनके भोजन में विष कहाँ से आया?
नौकर ने उसे सारी बात बतला दी। सुनते ही अंगदसिंह की पत्नी के पैरों तले से ज़मीन निकल गई। वह भागी हुई उस कमरे में गई जहाँ अंगदसिंह भोजन कर रहे थे, परन्तु उस के वहँा पहुँचने से पूर्व अंगदसिंह जल्दी-जल्दी भोजन कर चुके थे; उन्होंने थाल में एक कण भी न छोड़ा था। यह देखकर वह और भी घबरा गई। उसने तुरन्त राजवैद्य को बुलवाया और भोजन के विषय में सारी बात बताकर कहा-आप इन्हें कोई ऐसी औषधि दें जिससे इन पर विष का प्रभाव न हो।
राजवैद्य ने औषधि तैयार की, परन्तु अंगदसिंह ने यह कह कर औषधि लेने से इन्कार कर दिया कि जिस भोजन का भगवान को भोग लग गया, वह तो अमृतरुप हो गया, फिर औषधि किसलिये ली जाए? यह कहकर वे मन्दिर में चले गए और भगवान के ध्यान में बैठ गए। उनकी धर्मपत्नी, राजवैद्य और वह नौकर भी उनके निकट बैठ गए। इस प्रकार सारी रात बीत गई, परन्तु अंगदसिंह पर विष का रत्ती भर भी प्रभाव न हुआ। तब राजवैद्य ने कहा-विष का किंचित्मात्र भी कोई लक्षण इनमें प्रकट नहीं हुआ। ऐसा लगता है कि आप लोगों को धोखा हुआ है।
यह कहकर राजवैद्य वहाँ से चला गया और राजा दीनसलाहसिंह को सारी घटना से अवगत कराया। यह
सुनकर कि अंगदसिंह पर विष का ज़रा भी प्रभाव नहीं हुआ, उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। सोचने लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि नौकर ने धोखा दिया हो और भोजन में विष मिलाया ही न हो। यह सोचकर उसे बड़ा क्रोध आया।
उधर अंगदसिंह की पत्नी इसे भगवान की कृपा समझ रही थी और भगवान की इस कृपा पर उसकी आँखों से प्रेम और कृतज्ञता के अश्रुकण गिर रहे थे। प्रातः होने पर अंगदसिंह ध्यान से उठे। उन्होंने अपनी पत्नी से कहा-हमारा सैनगढ़ में रहना अब बिल्कुल ठीक नहीं है। जिस देश का राजा भगवान का भक्त होना तो दूर, भक्तों का ऐसा विरोधी हो और फिर साथ ही ऐसा लोभी भी हो कि दूसरे की हत्या करने को भी तत्पर हो जाए, वहाँ रहना कदापि उचित नहीं। इसलिए मैं तो अब भगवान जगन्नाथ जी की पुरी में रहूँगा, तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा करो। उसकी पत्नी ने कहा-मैं भी आपके साथ पुरी चलूँगी।
दिन बीत, रात आई। अंगदसिंह आधी रात तक कमरे में लेटे रहे। आधी रात होने पर वे उठे। चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था। उन्होंने धीरे-से अपनी पत्नी को जगाया और तब दोनों उस सन्नाटे में घर से बाहर निकले और पुरी की राह ली। प्रातः होने पर जब नौकरों ने अंगदसिंह और उनकी पत्नी को घर में न पाया, तो कोहराम मच गया। समाचार राजा दीनसलाहसिंह तक भी पहुंचा। राजा ने तुरन्त अपने कुछ विशेष सैनिकों को बुलाकर आदेश दिया-अंगदसिंह घर से भाग गया है। उसकी पत्नी भी उसके साथ है। अंगदसिंह वह मूल्यवान हीरा अवश्य ही अपने साथ ले गया होगा। तुम लोग अलग-अलग दिशा में जाओ और उसका पीछा करो। अधिकतर संभावना उसकी पुरी की ओर जाने की है, क्योंकि वह हीरा अंगदसिंह जगन्नाथ जी को समर्पित करना चाहता था। चाहे जैसे भी हो, उससे वह हीरा प्राप्त करके ले आओ, चाहे इसके लिए तुम्हें अंगदसिंह और उसकी स्त्री की हत्या ही क्यों न करनी पड़े।
सैनिक घोड़ें पर सवार होकर अलग-अलग रास्तों पर चल पड़े। उधर प्रातःकाल होने पर एक सरोवर देखकर अंगद सिंह ने वहाँ स्नानादि किया और भगवान के ध्यान में बैठ गए। उन्हें यह आशा कदापि नहीं थी कि सैनिक उनका पीछा करेंगे। अभी ध्यान में बैठे हुए उन्हें थोड़ी देर ही हुई थी कि सैनिक वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने अंगदसिंह को ध्यान से उठाया और बोले-राजा के आदेश से हम हीरा प्राप्त करने के लिए आये हैं। वह हीरा आप हमें दे दें, हम चुपचाप वापस लौट जायेंगे।
अंगदसिंह ने कहा-वह हीरा तो भगवान की अमानत है वह मैं किसी सूरत में भी तुम लोगों को नहीं दे सकता। सैनिकों के सरदार ने कहा-आप चुपचाप हीरा हमारे हवाले कर दें, इसी में आपकी बुद्धिमत्ता और जीवन की कुशलता है, अन्यथा हम उसे बलपूर्वक आपसे ले जायेंगे, चाहे हमें आपका वध ही क्यों न करना पड़े।
अंगदसिंह उस समय खाली हाथ थे। सोचने लगे-यदि इस समय खड़ग मेरे पास होता तो इनका इस प्रकार की बातें करने का साहस ही न होता। अब जैसी भगवान की इच्छा। तत्पश्चात् उन्होंने हीरा निकाला और यह कहते हुए कि ""प्रभो! दास की यह तुच्छ भेंट स्वीकार कीजिये'' वह हीरा उस सरोवर में फेंक दिया। यह देखकर सैनिक अवाक् रह गये। उनके ऐसे त्याग को देखकर वे बड़े प्रभावित हुए और उन्हें भगवान का सच्चा भक्त समझने लगे तत्पश्चात् वापस लौटकर उन्होंने सारा वृत्तान्त राजा को सुनाया। सुनकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। किन्तु इतने पर भी वह प्रभु-भक्तों की महिमा को न समझा, क्योंकि उस पर तो लोभ का भूत सवार था। गोताखोरों और उन सैनिकों को साथ लेकर वह उस सरोवर पर स्वयं गया और गोताखोरों को हीरा खोजने का आदेश दिया। गोताखोरों ने सरोवर का चप्पा-चप्पा छान मारा, हीरा न मिलना था, न मिला। वह तो वहँा पहुँच चुका था, जहां की वह अमानत था। विवश होकर राजा राजधानी वापस लौट गया।
उधर सैनिकों के जाने के बाद अंगदसिंह अपनी पत्नी के साथ पुरी के लिये पुनः चल पड़े थे। उसी रात भगवान ने उन्हें स्वप्न में दर्शन देकर कहा-अंगद! हमने तुम्हारी भेंट स्वीकार कर ली है। वह हीरा हमारे पास पहुंच चुका है और तुम्हारी इच्छानुसार हमारे मुकुट में सुशोभित हो रहा है। तुम शीघ्र पुरी पहुंचो। भगवान के इन वचनों के साथ ही अंगदसिंह की नींद टूट गई। उन्होंने अपनी पत्नी को जगाकर स्वप्न के विषय में बतलाया, फिर कहा-हमारी तुच्छ भेंट भगवान ने कृपा करके स्वीकार कर ली, मानो आज हमारे भाग्योदय हो गये। भगवान के आदेशानुसार अब हमें शीघ्रातिशीघ्र पुरी पहुँच जाना चाहिए। बिना मार्ग में विश्राम किये दोनों शीघ्र ही पुरी पहुंच गए। उन्होने सर्वप्रथम मन्दिर में पहुँचकर भगवान के दर्शन किये। उन्होंने देखा कि वह अनमोल हीरा भगवान के मुकुट में शोभा पा रहा है। यह देखकर अंगदसिंह की आँखों से प्रेमाश्रु प्रवाहित होने लगे। उन्होंने अब पुरी में ही रहकर भजन-सुमिरण करने का निश्चय किया।
कुछ दिनों के उपरान्त राजा दीनसलाहसिंह को अंगदसिंह और उनकी पत्नी के विषय में समाचार मिला कि वे दोनों पुरी में रहकर साधु सन्तों की सेवा और भगवान का भजन-सुमिरण करते हुए जीवन व्यतीत कर रहे हैं, तो वह अपनी करनी पर अत्यन्त लज्जित हुआ। उसके विचारों ने पलटा खाया और उन्हें वापस लौटा लाने के लिए वह स्वयं पुरी पहुँचा। अंगदसिंह का पता लगाया और अपने अपराधों के लिए उनसे क्षमा मांगी, तत्पश्चात् सैनगढ़ चलकर राजकाज संभालने के लिए उनसे प्रार्थना की। अंगदसिंह ने कहा-मेरा मन तो यहँा रम गया है, इसलिए मैं अब वापस नहीं जाऊँगा। शेष रही राजकाज की बात, सो उसकी अब कोई इच्छा मेरे मन में नहीं रही। जो सुख और आनन्द यहाँ रूखी-सूखी खाकर भगवान का भजन-सुमिरण करने और साधु-सन्तों की सेवा करने में मिलता है, वह ऐश्वर्य भोगों और भाँति-भाँति के व्यंजनों में कहाँ? इसलिए सैनगढ़ वापस चलने के लिए आप मुझसे मत कहिए।
किन्तु राजा नहीं माना और बार-बार जिद्द करने लगा। उस रात भगवान ने अंगदसिंह को स्वप्न में दर्शन देकर राजा की बात स्वीकार कर लेने का आदेश दिया। भगवान का आदेश भला भक्त कैसे टाल सकता था? अंगदसिंह राजा के साथ सैनगढ़ लौटे। आते ही राजा ने उनका राज्याभिषेक कर राज्य की बागडोर उनके सुपुर्द की। तत्पश्चात् अंगदसिंह को साथ लेकर राजा दीनसलाहसिंह गुरुदेव के आश्रम पर पहुँचा, उनसे नाम-दीक्षा ली और फिर आश्रम पर ही रहकर शेष जीवन भक्ति-भजन और सेवा में व्यतीत किया।
अंगदसिंह और उनकी पत्नी तो अब नियमितरुप से गुरुदेव के आश्रम पर जाकर सत्संग का लाभ प्राप्त करने लगे। कभी-कभी अंगदसिंह के अऩुरोध पर गुरुदेव महल में भी कृपा करते जहां सत्सग का प्रवाह चलता। इस प्रकार अंगदसिंह और उनकी पत्नी ने अपना जन्म तो सफल किया ही, उनके माध्यम से अन्य अनेकों जीवों का भी सुधार एवं उद्धार हुआ।
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